भारतीय शेयर बाजार में लगातार तीसरे दिन भारी गिरावट दर्ज की गई है। BSE Sensex 1,000 अंकों से नीचे और Nifty 50 300 अंक से अधिक गिरकर अप्रैल 2024 के निचले स्तर पर पहुँच गया है। इस दौरान भारतीय बाजार से 13 लाख करोड़ रुपये का मार्केट कैप वाष्पित हो गया। आइए जानते हैं, इस गिरावट के पीछे 5प्रमुख कारण:
कमजोर Q1 परिणाम: मार्केट की नींव हिल रही है
इस बार Q1 के परिणाम उम्मीदों से कमजोर रहे हैं, जिसने मार्केट में बिकवाली का दबाव बढ़ाया है। उदाहरण के लिए, टीसीएस जैसे दिग्गज कंपनी के परिणाम निराशाजनक रहे। उनकी ग्रोथ धीमी थी, मार्जिन पर दबाव दिखा, और सबसे चौंकाने वाली बात, 12,000 कर्मचारियों की छंटनी शुरू हो गई, जो उनके कुल वर्कफोर्स का लगभग 2% है। इसका मतलब है कि हर 50 कर्मचारियों में से एक की नौकरी चली गई। कंपनियां बिना कारण इतने बड़े पैमाने पर छंटनी नहीं करतीं। यह इस बात का संकेत है कि भविष्य में मांग कम होने की आशंका है, जिसके चलते लागत में कटौती शुरू हो रही है। टीसीएस की कॉन्फ्रेंस कॉल में भी प्रबंधन ने भविष्य की ग्रोथ पर कोई स्पष्ट दृष्टिकोण नहीं दिया, जिससे निवेशकों ने पूरे आईटी सेक्टर में प्रॉफिट बुकिंग शुरू कर दी। जब लीडर कमजोर पड़ता है, तो पूरा सेक्टर दबाव में आ जाता है।
इसी तरह, बजाज फाइनेंस के Q1 परिणामों के बाद उनका शेयर 5% तक गिर गया। उनके एमएसएमई लोन सेगमेंट में तनाव के संकेत दिखे, जिससे डिफॉल्ट जोखिम का डर बढ़ा। यह डर केवल बजाज तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे बैंकिंग और एनबीएफसी सेक्टर पर असर पड़ा। एफएमसीजी, ऑटो, और मेटल सेक्टर की कई कंपनियों के परिणाम भी औसत से कम रहे, जिसने निवेशकों का विश्वास हिलाया। निफ्टी का 50% हिस्सा आईटी और बैंकिंग सेक्टर से आता है, इसलिए इन सेक्टर्स की कमजोरी ने इंडेक्स को नीचे खींच लिया।
ग्लोबल अनिश्चितता: वैश्विक तनाव का असर
वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता भी मार्केट की गिरावट का एक बड़ा कारण है। अमेरिका और चीन के बीच ट्रेड टेंशन फिर से बढ़ रहा है। अमेरिकी नीतियां, खासकर ट्रंप की ओर से भारत, चीन, और अन्य देशों पर ड्यूटी की धमकियां, वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता पैदा कर रही हैं। दूसरी ओर, भारत और चीन के रिश्ते सुधर रहे हैं। भारत ने चीनी नागरिकों के लिए वीजा नीति को खोल दिया है, जो पहले प्रतिबंधित थी। हाल ही में भारत, चीन, और रूस की संयुक्त बैठक को विशेषज्ञ रणनीतिक गठबंधन का संकेत मान रहे हैं। यह गठबंधन अमेरिका के वैश्विक प्रभुत्व के लिए चुनौती बन सकता है।
ऐसे में वैश्विक निवेशक जोखिम भरे बाजारों, जैसे भारत, से पैसा निकाल रहे हैं। यूरोप में भी राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक मंदी की चेतावनियां निवेशकों का मूड खराब कर रही हैं। इससे ग्लोबल फंड्स भारत जैसे उभरते बाजारों में निवेश रोक रहे हैं या पैसा निकाल रहे हैं।
FII की भारी बिकवाली: बड़े खिलाड़ियों का बाहर निकलना
जुलाई 2025 में विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) ने लगभग 1.43 लाख करोड़ रुपये की बिकवाली की। यह कोई छोटी-मोटी प्रॉफिट बुकिंग नहीं है। यह दर्शाता है कि बड़े निवेशक भारत और अमेरिका के बीच बढ़ती दूरी से सतर्क हो गए हैं। जब इतने बड़े खिलाड़ी पैसा निकालते हैं, तो इसका असर लार्ज कैप और बैंकिंग सेक्टर पर साफ दिखता है। निफ्टी जैसे इंडेक्स कमजोर होते हैं, और बाजार का समग्र सेंटिमेंट भी प्रभावित होता है।
डॉलर और क्रूड की कीमतों में उछाल
डॉलर का मूल्य 86.5 के पार चला गया है, जो उभरते बाजारों के लिए चुनौती है। जब डॉलर मजबूत होता है, तो विदेशी निवेशक उभरते बाजारों से पैसा निकालकर अमेरिकी बॉन्ड्स में लगाते हैं। साथ ही, डॉलर की मजबूती से क्रूड ऑयल का आयात महंगा हो जाता है। भारत जैसे आयातक देश के लिए यह अतिरिक्त दबाव का कारण बनता है। क्रूड की बढ़ती कीमतें और डॉलर का मजबूत होना मार्केट पर दबाव डाल रहा है।
मिड और स्मॉल कैप में दबाव
जब बाजार में तेजी होती है, तो मिड और स्मॉल कैप शेयरों में निवेश बढ़ता है, क्योंकि इनमें रिटर्न की संभावना ज्यादा होती है। लेकिन गिरावट के समय सबसे पहले यहीं बिकवाली शुरू होती है। निफ्टी मिड 100 और स्मॉल कैप 100 अपने उच्चतम स्तर से 8-10% नीचे आ चुके हैं। कुछ शेयर तो दो हफ्तों में 20-25% तक गिर गए। FII का बड़ा निवेश इन सेगमेंट्स में था, और सेंटिमेंट कमजोर होने पर निवेशक तेजी से बाहर निकल रहे हैं। इससे मिड और स्मॉल कैप में गिरावट का असर पूरे मार्केट पर पड़ रहा है।
टेक्निकल सपोर्ट टूटना
निफ्टी ने अपना महत्वपूर्ण सपोर्ट लेवल 24,900 तोड़ दिया है। टेक्निकल इंडिकेटर्स जैसे RSI और MACD भी बेयरिश जोन में हैं। इस वजह से विशेषज्ञ “सेल ऑन राइज” की रणनीति सुझा रहे हैं। जब फंडामेंटल और टेक्निकल दोनों कमजोर हों, तो बिकवाली का दबाव बढ़ना स्वाभाविक है।
IPO की बाढ़: लिक्विडिटी का शिफ्ट
वित्तीय वर्ष 2026 के पहले चार महीनों में लगभग 80,000 करोड़ रुपये के IPO आ चुके हैं। इससे बाजार की लिक्विडिटी IPOs की ओर शिफ्ट हो रही है। पहले स्टॉक्स में लगने वाला पैसा अब IPOs में जा रहा है, जिससे मिड और स्मॉल कैप स्टॉक्स पर सबसे ज्यादा असर पड़ रहा है। प्रीमियम पर ट्रेड करने वाले स्टॉक्स में प्रॉफिट बुकिंग हो रही है।
छिपा हुआ सच: कस्टोडियन बैंक और ऑर्डर फ्लो मैनिपुलेशन
मार्केट में एक डार्क पूल ट्रुथ है, जिसे कस्टोडियन बैंक ऑर्डर फ्लो मैनिपुलेशन कहते हैं। बड़े संस्थागत निवेशक, जैसे म्यूचुअल फंड, सॉवरेन वेल्थ फंड, और विदेशी पेंशन फंड, अपने बड़े ऑर्डर्स को कस्टोडियन बैंकों (जेपी मॉर्गन, सिटी बैंक, एचएसबीसी आदि) के जरिए निष्पादित करते हैं। ये ऑर्डर्स डार्क पूल रूट्स के जरिए प्रोसेस होते हैं, जहां ट्रेडिंग पारदर्शी नहीं होती। वॉल्यूम डेटा या प्राइस मूवमेंट का सही संकेत मार्केट को नहीं मिलता।
जब कस्टोडियन बैंकों को पता होता है कि अगले कुछ महीनों में भारी FII आउटफ्लो होने वाला है, तो वे अपने इंटरनल ट्रेडिंग डेस्क से पहले बिकवाली कर मार्केट को नीचे खींचते हैं, फिर क्लाइंट के ऑर्डर्स निष्पादित करते हैं। यह एक तरह का लीगल इनसाइडर ट्रेडिंग है, जो रिटेल निवेशकों के लिए अदृश्य रहता है। इस डेटा तक आम निवेशकों की पहुंच नहीं होती, जिससे वे केवल FII/DII डेटा देखकर निवेश करते हैं। जब मार्केट गिरता है, और FII सेलिंग का डेटा दिखाई नहीं देता, तो समझ लीजिए कि कुछ अंदर ही अंदर बेचा जा रहा है।
क्या यह गिरावट खरीदारी का मौका है?
यह गिरावट एक सामान्य प्रॉफिट बुकिंग का हिस्सा है, जो अप्रैल के बाद की एकतरफा रैली के बाद आई है। कंपनियों के परिणाम कुछ समय की कहानी हैं। FII की बिकवाली भी तब तक रहेगी, जब तक भारत और अमेरिका के बीच कोई डील पूरी नहीं हो जाती। इसलिए, यह गिरावट डरने की नहीं, बल्कि मौका तलाशने की है। जब मार्केट स्थिर होगा, तो मजबूत फंडामेंटल वाले शेयरों में निवेश के अवसर बनेंगे।