वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल (WGC) की 2024-25 की रिपोर्ट के अनुसार, सेंट्रल बैंकों द्वारा सोने की खरीदारी पिछले तीन वर्षों से अभूतपूर्व स्तर पर है, जो वैश्विक आर्थिक और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं को दर्शाता है। यह लेख सेंट्रल बैंकों की सोने की खरीदारी, इसके कारणों, और इसके संभावित आर्थिक प्रभावों का विश्लेषण करता है। साथ ही, यह इस सवाल का जवाब देता है कि क्या यह खरीदारी एक बड़े आर्थिक तूफान का संकेत है या केवल एक रणनीतिक कदम।
सेंट्रल बैंकों की सोने की खरीदारी: प्रमुख आंकड़े
- 2022-2024 में खरीदारी: सेंट्रल बैंकों ने लगातार तीन वर्षों तक हर साल 1,000 टन से अधिक सोना खरीदा, जो 2010-2021 के औसत (473 टन) से दोगुना से भी अधिक है। 2024 में कुल खरीदारी 1,045 टन रही, जिसमें चौथी तिमाही में 333 टन की रिकॉर्ड खरीद शामिल है।
- प्रमुख खरीदार:
- पोलैंड: 2024 में 90 टन खरीद, कुल रिजर्व 448 टन। 2025 की पहली तिमाही में और 49 टन जोड़े, जिससे रिजर्व 497 टन (21% कुल रिजर्व) हो गया।
- भारत: रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने 2024 में 73 टन खरीदा, जो 2023 (16 टन) से चार गुना अधिक है। कुल रिजर्व 876 टन (11% कुल रिजर्व)।
- चीन: पीपल्स बैंक ऑफ चाइना ने 2024 में 44 टन खरीदा, कुल रिजर्व 2,292 टन (6.5% कुल रिजर्व)। कुछ अनुमानों के अनुसार, चीन के पास 5,000 टन से अधिक अप्रकाशित सोना हो सकता है।
- तुर्की: 2024 में 75 टन खरीद, जो उच्च मुद्रास्फीति (86% in 2022) के बीच रिजर्व को मजबूत करने का हिस्सा था।
- मूल्य वृद्धि: सोने की कीमत 2022 में $1,828/ऑन्स से बढ़कर 2025 में $3,500/ऑन्स हो गई, यानी 8 महीनों में $1,000 की वृद्धि।
- स्थानीय खरीद: 36 में से 19 सेंट्रल बैंकों ने स्थानीय खदानों से सोना खरीदा, जिससे विदेशी मुद्रा की बचत हुई और स्थानीय खनन क्षेत्र को बढ़ावा मिला।
सोने की खरीदारी के कारण
WGC की 2025 सेंट्रल बैंक गोल्ड रिजर्व्स सर्वे (73 बैंकों के साथ) और अन्य स्रोतों के आधार पर, सेंट्रल बैंकों की सोने की खरीदारी के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:
- भू-राजनीतिक अनिश्चितता: रूस-यूक्रेन युद्ध (2022 से) और वैश्विक व्यापार तनाव (जैसे, अमेरिकी टैरिफ नीतियां) ने सोने को सुरक्षित संपत्ति के रूप में महत्वपूर्ण बनाया। 40% बैंकों ने भू-राजनीतिक जोखिम को सोना खरीदने का प्रमुख कारण बताया।
- मुद्रास्फीति के खिलाफ बचाव: 85% रिजर्व मैनेजर सोने को मुश्किल समय में सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाली संपत्ति मानते हैं। यह मुद्रास्फीति और करेंसी मूल्यह्रास के खिलाफ प्रभावी हेज है।
- पोर्टफोलियो विविधीकरण: 81% बैंक सोने को पोर्टफोलियो में संतुलन बनाए रखने वाला मानते हैं। यह अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करता है, खासकर उभरते बाजारों में।
- डॉलर की हिस्सेदारी में कमी: 73% बैंकों का मानना है कि डॉलर की वैश्विक हिस्सेदारी घटेगी, और सोना एक मजबूत वैकल्पिक संपत्ति बन रहा है। यह डी-डॉलराइजेशन की रणनीति का हिस्सा है, विशेष रूप से रूस और चीन जैसे देशों में।
- घरेलू भंडारण पर जोर: भारत और नाइजीरिया जैसे देशों ने 2024 में विदेशों (यूके, यूएस) से सोना वापस मंगाया, जो रणनीतिक भंडारण और राष्ट्रीय सुरक्षा को दर्शाता है।
आर्थिक प्रभाव
सेंट्रल बैंकों की सोने की खरीदारी का वैश्विक और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं पर कई प्रभाव हैं:
- सोने की कीमतों में वृद्धि: सेंट्रल बैंकों की मांग ने 2024 में सोने की कीमत को $3,500/ऑन्स तक पहुंचाया। WGC और कैपिटल इकॉनॉमिक्स का अनुमान है कि 2025 के अंत तक यह $3,700-$3,800/ऑन्स तक बढ़ सकता है।
- मुद्रा स्थिरता: सोना मुद्रास्फीति और करेंसी अस्थिरता के खिलाफ हेज प्रदान करता है। उदाहरण के लिए, तुर्की ने 2022 में 86% मुद्रास्फीति के बीच सोना खरीदा।
- स्थानीय खनन को बढ़ावा: स्थानीय खदानों से खरीदारी ने उभरते बाजारों में खनन उद्योग को प्रोत्साहन दिया, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार की बचत हुई।
- डी-डॉलराइजेशन: सोने की खरीदारी अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने की रणनीति का हिस्सा है, विशेष रूप से रूस, चीन, और भारत जैसे देशों में।
- वैश्विक विश्वास: सोने की मांग सेंट्रल बैंकों के बीच वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता को दर्शाती है, जो निवेशकों और बाजारों में अस्थिरता बढ़ा सकती है।
क्या यह आर्थिक तूफान का संकेत है?
सेंट्रल बैंकों की सोने की खरीदारी को दो दृष्टिकोणों से देखा जा सकता है:
- रणनीतिक कदम:
- अधिकांश सेंट्रल बैंक, विशेष रूप से उभरते बाजारों में, सोने को दीर्घकालिक मूल्य भंडार और जोखिम विविधीकरण के लिए खरीद रहे हैं। यह रूस-यूक्रेन युद्ध (2022) और वैश्विक प्रतिबंधों के बाद शुरू हुआ, जब रूस ने डी-डॉलराइजेशन नीति अपनाई।
- WGC सर्वे में 95% रिजर्व मैनेजरों का मानना है कि 2025 में सोने की खरीदारी बढ़ेगी, जो 2024 से 17% अधिक है। यह एक सक्रिय रणनीति को दर्शाता है, न कि तात्कालिक संकट का संकेत।
- भारत जैसे देशों में, RBI का सोना खरीदना (2024 में 73 टन) रुपये के मूल्यह्रास (2022 में 10%) को नियंत्रित करने और रिजर्व को मजबूत करने का हिस्सा है।
- आर्थिक तूफान की आशंका:
- भू-राजनीतिक तनाव (जैसे, रूस-यूक्रेन, अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध) और वैश्विक मुद्रास्फीति (2022 में 8-10% कई देशों में) ने सेंट्रल बैंकों को सुरक्षित संपत्तियों की ओर धकेला।
- X पर पोस्ट्स में यूरोपीय देशों द्वारा अमेरिका से सोना वापस मांगने की चर्चा है, जो अमेरिकी अर्थव्यवस्था और डॉलर पर विश्वास में कमी को दर्शाता है।
- हालांकि, WGC और ECB का कहना है कि यह खरीदारी तात्कालिक संकट से अधिक दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है। सोने की मांग का 70% अभी भी आभूषण और निवेश से आता है, जो बाजार की स्थिरता को दर्शाता है।
भविष्य की संभावनाएं
- कीमतें: सोने की कीमत 2025 में $3,700-$3,800/ऑन्स तक पहुंच सकती है, जो सेंट्रल बैंकों की मांग और ETF निवेश के कारण होगी।
- खरीदारी का रुझान: 48% उभरते बाजारों के सेंट्रल बैंक 2025 में सोना खरीदने की योजना बना रहे हैं, जबकि केवल 21% विकसित देश ऐसा करेंगे।
- जोखिम: उच्च कीमतों ($3,500/ऑन्स) के कारण कुछ बैंक खरीदारी धीमी कर सकते हैं, लेकिन भू-राजनीतिक और आर्थिक अनिश्चितता इसे बनाए रखेगी।
- भारत का परिदृश्य: भारत, जो अब दुनिया का सबसे बड़ा आभूषण बाजार है, 2024 में केवल 2% मांग में कमी देखी। त्योहारी और शादी के मौसम में मांग मजबूत रही। RBI की खरीदारी और स्थानीय भंडारण (58% सोना अब भारत में) रणनीतिक मजबूती को दर्शाता है।
सेंट्रल बैंकों की सोने की खरीदारी एक रणनीतिक कदम है, जो भू-राजनीतिक अनिश्चितता, मुद्रास्फीति, और डॉलर पर निर्भरता कम करने की इच्छा से प्रेरित है। यह तातrinoिक आर्थिक तूफान का संकेत कम और दीर्घकालिक रिजर्व प्रबंधन का हिस्सा अधिक है। हालांकि, वैश्विक तनाव और मुद्रास्फीति की स्थिति इसे और बढ़ा सकती है। भारत जैसे उभरते बाजारों में, सोना न केवल आर्थिक स्थिरता का प्रतीक है, बल्कि स्थानीय खनन और आत्मनिर्भरता को भी बढ़ावा दे रहा है। WGC की भविष्यवाणी के अनुसार, 2025 में सोने की मांग और कीमतें दोनों बढ़ेंगी, जिससे यह निवेशकों और सेंट्रल बैंकों के लिए एक महत्वपूर्ण संपत्ति बनी रहेगी।