भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है, लेकिन हाल के कुछ घटनाक्रमों ने इसे धीमा करने की आशंका बढ़ा दी है। एशियाई विकास बैंक (एडीबी) ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए भारत की विकास दर का अनुमान 6.7% से घटाकर 6.5% कर दिया है। यह 0.20% की कमी वैश्विक व्यापार अनिश्चितताओं और अमेरिकी टैरिफ नीतियों के प्रभाव के कारण है। इसके साथ ही, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने भी अर्थव्यवस्था को लेकर अहम चेतावनी दी है। उनके मुताबिक, रेपो रेट में कटौती कोई जादुई समाधान नहीं है जो तुरंत निवेश को बढ़ा दे। इस लेख में हम टैरिफ वॉर के प्रभाव, एडीबी के अनुमान, और रघुराम राजन की चेतावनी के विभिन्न पहलुओं को विस्तार से समझेंगे।
टैरिफ वॉर का भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर
वैश्विक स्तर पर व्यापार युद्ध, खासकर अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ, भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव डाल सकते हैं। एडीबी की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी टैरिफ और नीतिगत अनिश्चितताओं के कारण भारत के निर्यात और निवेश पर असर पड़ सकता है। इससे भारत की विकास दर में मामूली कमी की आशंका है। हालांकि, मजबूत घरेलू खपत, बेहतर मानसून, और कृषि व सेवा क्षेत्र की मजबूती के कारण भारत अभी भी दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शुमार है। एडीबी का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026-27 में विकास दर 6.7% तक पहुंच सकती है, जो दर्शाता है कि भारत की आर्थिक नींव मजबूत बनी हुई है।
रघुराम राजन की चेतावनी: निवेश में कमी क्यों?
रघुराम राजन, जो आरबीआई के पूर्व गवर्नर और शिकागो विश्वविद्यालय में वित्त के प्रोफेसर हैं, ने हाल ही में भारतीय अर्थव्यवस्था की चुनौतियों पर प्रकाश डाला। उनके अनुसार, रेपो रेट में हाल की 0.5% की कटौती (जून 2025 में) और फरवरी से अब तक की 1% की कुल कटौती निवेश को तुरंत बढ़ाने के लिए पर्याप्त नहीं है। राजन का कहना है कि पहले उच्च ब्याज दरों को निवेश में कमी का कारण माना जाता था, लेकिन अब ब्याज दरें अपेक्षाकृत कम हैं, फिर भी भारतीय उद्योग निवेश करने में सतर्कता बरत रहे हैं।
उनके मुताबिक, निवेश को बढ़ावा देने के लिए केवल ब्याज दरों में कटौती काफी नहीं है। इसके लिए पारदर्शी नीतियां, प्रतिस्पर्धी माहौल, और मजबूत लॉजिस्टिक नेटवर्क जैसे कारक जरूरी हैं। सांख्यिकी मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि निजी क्षेत्र का निवेश 11 साल के निचले स्तर पर है। कंपनियां नई फैक्ट्रियां, मशीनें, या प्रोजेक्ट्स में पैसा लगाने से हिचक रही हैं। राजन का मानना है कि वैश्विक वित्तीय संकट (2008-09) के बाद से भारतीय उद्योगों ने सतर्क रवैया अपनाया है, जो अब भी जारी है।
खपत में बदलाव: उच्च मध्यम वर्ग भी खर्च में कटौती कर रहा
रघुराम राजन ने एक और महत्वपूर्ण बिंदु उठाया है कि पहले निम्न मध्यम वर्ग और ग्रामीण क्षेत्रों में खपत की कमी को निवेश में कमी का कारण माना जाता था। लेकिन अब स्थिति बदल गई है। अब उच्च मध्यम वर्ग भी खर्च करने में कटौती कर रहा है। यह अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि भारत की अर्थव्यवस्था काफी हद तक खपत पर निर्भर है। अगर उच्च मध्यम वर्ग की खपत कम हो रही है, तो यह मांग में कमी का संकेत है, जो विकास दर को और प्रभावित कर सकता है।
महंगाई और कोर इनफ्लेशन पर राजन की सलाह
महंगाई के मोर्चे पर, राजन का कहना है कि भारत की स्थिति संतोषजनक है। जून 2025 में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित महंगाई दर 2.1% तक गिर गई है। हालांकि, राजन ने सुझाव दिया कि आरबीआई को केवल कुल महंगाई (हेडलाइन इनफ्लेशन) पर ही नहीं, बल्कि कोर इनफ्लेशन पर भी नजर रखनी चाहिए। कोर इनफ्लेशन, जिसमें खाद्य और ईंधन की कीमतों को शामिल नहीं किया जाता, अभी भी कुल महंगाई से थोड़ा अधिक है। फिर भी, यह नियंत्रण में है। राजन ने यह भी कहा कि वैश्विक स्तर पर आयात शुल्क बढ़ने (जैसे अमेरिका में) से निर्यातक देशों पर दबाव पड़ सकता है, लेकिन भारत की महंगाई की स्थिति अभी स्थिर है।
क्या चाहिए अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए?
रघुराम राजन के अनुसार, अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जाने चाहिए:
- पारदर्शी नीतियां: कारोबारी माहौल में पारदर्शिता बढ़ाने से कंपनियों का भरोसा बढ़ेगा, जिससे निवेश को प्रोत्साहन मिलेगा।
- प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा: विभिन्न क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा बढ़ने से कंपनियां अपने फायदे और बाजार में टिकने के लिए निवेश करेंगी।
- नियमों का सरलीकरण: जटिल नियमों को आसान करने से निजी निवेश को गति मिल सकती है।
- मजबूत बुनियादी ढांचा: लॉजिस्टिक और बुनियादी ढांचे में सुधार से उद्योगों को निवेश के लिए प्रेरणा मिलेगी।
- मानव पूंजी में निवेश: शिक्षा और कौशल विकास पर ध्यान देने से दीर्घकालिक विकास को समर्थन मिलेगा।
क्या रेपो रेट कटौती से होगा बदलाव?
रघुराम राजन ने साफ कहा है कि रेपो रेट में कटौती कोई तुरंत समाधान नहीं है। इसका असर दिखने में समय लगेगा। उनके मुताबिक, अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए व्यापक नीतिगत सुधारों की जरूरत है। सिर्फ ब्याज दरों में कटौती से कंपनियां निवेश के लिए प्रेरित नहीं होंगी। साथ ही, वैश्विक व्यापार तनाव और टैरिफ युद्ध के कारण निर्यात पर पड़ने वाला दबाव भी भारत की विकास दर को प्रभावित कर सकता है। फिर भी, भारत की मजबूत घरेलू मांग और कृषि व सेवा क्षेत्र की ताकत इसे वैश्विक मंदी के प्रभाव से बचाने में मदद कर रही है।
भारत की अर्थव्यवस्था का भविष्य
एडीबी के संशोधित अनुमान और रघुराम राजन की चेतावनी से यह स्पष्ट है कि भारत की अर्थव्यवस्था के सामने चुनौतियां हैं, लेकिन इसकी नींव मजबूत है। टैरिफ वॉर और वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद, भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक बना रहेगा। हालांकि, निजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए सरकार और नीति निर्माताओं को सक्रिय कदम उठाने होंगे। पारदर्शिता, प्रतिस्पर्धा, और नीतिगत सुधारों के साथ-साथ बुनियादी ढांचे और शिक्षा में निवेश भारत को 2047 तक उच्च मध्य आय वाली अर्थव्यवस्था बनाने के लक्ष्य को हासिल करने में मदद कर सकता है।
