नेपाल में हिंसक प्रदर्शन: सोशल मीडिया बैन और भ्रष्टाचार के खिलाफ Gen-Z का गुस्सा फूटा।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। नेपाल में हालात दिन-ब-दिन बिगड़ते जा रहे हैं। सोशल मीडिया बैन के खिलाफ शुरू हुआ जनरेशन Z (Gen-Z) का आंदोलन अब हिंसक हो चुका है। प्रदर्शनकारियों ने संसद भवन में आग लगा दी, राष्ट्रपति भवन, पीएम निवास, गृह मंत्री के घर और केंद्रीय प्रशासनिक इमारतों में तोड़फोड़ की। स्थिति इतनी बेकाबू हो गई कि प्रदर्शनकारियों ने पूर्व पीएम शेर बहादुर देउबा और उनकी पत्नी आरजू राणा को उनके घर में घुसकर पीटा, वित्त मंत्री विष्णु पोडौल को काठमांडू में उनके घर के बाहर दौड़ा-दौड़ाकर मारा। एक पूर्व पीएम की पत्नी को जिंदा जलाने की दिल दहलाने वाली घटना भी सामने आई है।
प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने इस हिंसा के बीच इस्तीफा दे दिया और सेना उन्हें हेलिकॉप्टर से किसी अज्ञात जगह ले गई। कयास लगाए जा रहे हैं कि उन्हें शेख हसीना की तरह देश छोड़ना पड़ सकता है। अब तक इस हिंसा में 22 लोगों की मौत हो चुकी है और 400 से ज्यादा लोग घायल हैं। हिंसा अभी भी थमने का नाम नहीं ले रही।
सवाल यह है कि आखिर ये आंदोलन इतना उग्र क्यों हो गया? क्या सिर्फ सोशल मीडिया बैन इसके पीछे की वजह है, या कुछ और गहरे कारण हैं? आइए जानते हैं नेपाल में भड़की इस हिंसा के 6 बड़े कारण…
‘नेताओं के बच्चे ऐश में, और हम पर बैन’
नेपाल के Gen-Z यानी 1997 से 2012 के बीच जन्मे युवाओं में बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार को लेकर जबरदस्त गुस्सा था। नेताओं के बच्चों की विदेश यात्राएं, शानदार पार्टियां और ब्रांडेड सामान की सोशल मीडिया पर चर्चा ने इस गुस्से को और भड़काया। नेपाल में ‘नेपो बेबी’ कैंपेन ट्रेंड करने लगा, जो इंडोनेशिया और फलस्तीन से प्रेरित था। जब सरकार ने सोशल मीडिया पर बैन लगाया, तो युवाओं ने इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला माना।
तीन बड़े घोटाले
नेपाल में पिछले चार साल में तीन बड़े घोटालों ने युवाओं का सरकार के प्रति गुस्सा चरम पर पहुंचा दिया:
- 2021: 54,600 करोड़ रुपये का गिरी बंधु भूमि स्वैप घोटाला।
- 2023: 13,600 करोड़ रुपये का ओरिएंटल कोऑपरेटिव घोटाला।
- 2024: 69,600 करोड़ रुपये का कोऑपरेटिव घोटाला।
इन घोटालों ने जनता का भरोसा तोड़ा और सोशल मीडिया बैन ने इस आग में घी डालने का काम किया।
बेरोजगारी और आर्थिक तंगी
नेपाल में बेरोजगारी और आर्थिक असमानता बड़ी समस्या बन चुकी है। 2019 में बेरोजगारी दर 10.39% थी, जो अब बढ़कर 10.71% हो गई है। महंगाई दर भी 4.6% से बढ़कर 5.2% हो गई है। देश की 56% संपत्ति सिर्फ 20% लोगों के पास है, जो समाज में बढ़ती असमानता को दर्शाता है। भ्रष्टाचार और खराब आर्थिक नीतियों ने युवाओं को हाशिए पर धकेल दिया।
सियासी अस्थिरता: 5 साल में 3 सरकारें
नेपाल में राजनीतिक स्थिरता की कमी भी एक बड़ा कारण है। पिछले पांच साल में तीन सरकारें बदलीं:
- जुलाई 2021: शेर बहादुर देउबा प्रधानमंत्री बने।
- दिसंबर 2022: पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ ने सत्ता संभाली।
- जुलाई 2024: केपी शर्मा ओली प्रधानमंत्री बने।
इस अस्थिरता का असर आर्थिक और सामाजिक विकास पर पड़ा, जिसने युवाओं में बेचैनी बढ़ाई।
‘नेपाल सिर्फ विदेशी ताकतों का मोहरा’
जुलाई 2024 में केपी शर्मा ओली के सत्ता में आने के बाद उनका चीन की ओर झुकाव बढ़ा। पहले की सरकारें अमेरिका और भारत की नीतियों के साथ चल रही थीं। सोशल मीडिया बैन के दौरान सिर्फ चीनी ऐप टिकटॉक को चलने की अनुमति थी, जिससे युवाओं को लगा कि नेपाल बड़े देशों के दबाव में मोहरा बन रहा है।
भारत से बढ़ती दूरी
ओली के सत्ता में आने के बाद नेपाल ने लिपुलेख दर्रे को अपने नक्शे में शामिल किया, जिससे भारत के साथ तनाव बढ़ा। चीन से बढ़ती नजदीकी ने भी भारत के साथ रिश्तों को प्रभावित किया। इससे नेपाल की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा, जिसने युवाओं में असंतोष को और हवा दी।
