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चीन का सोने पर बड़ा खेल: 90 टन बेचकर मचाई हलचल, भारत में कीमतों पर क्या पड़ेगा असर

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Last updated: July 27, 2025 6:17 pm
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China's big play on gold: created a stir by selling 90 tons, what will be the effect on prices in India
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दुनिया भर के गोल्ड मार्केट में इन दिनों हड़कंप मचा हुआ है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल (WGC) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, चीन ने जून 2025 में करीब 90 टन सोना बेच दिया, जिससे ग्लोबल गोल्ड मार्केट में भारी उथल-पुथल मच गई है। चीन का यह कदम सोने की कीमतों पर क्या असर डालेगा और भारत में गोल्ड रेट किस रुख में जाएगा? आइए जानते हैं पूरी डिटेल्स

चीन ने जून 2025 में शंघाई गोल्ड एक्सचेंज से 90 टन सोना बेचा, जिसने वैश्विक सोने के बाजार में हलचल मचा दी। इसके साथ ही, चीन ने अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड्स की भारी बिक्री शुरू की, जिससे कई सवाल उठ रहे हैं। क्या चीन आर्थिक संकट से जूझ रहा है, या यह डी-डॉलराइजेशन और ब्रिक्स की रणनीति का हिस्सा है? इस लेख में हम इन सवालों का विश्लेषण करेंगे और भारत पर इसके प्रभाव को समझेंगे।

चाइना का सोना बेचने का कारण

चीन ने हाल के वर्षों में सोने का भारी भंडारण किया है। 2024 की शुरुआत में इसके पास 2,264 टन सोना था, और 2023 में इसने 225 टन से अधिक सोना खरीदा। नवंबर 2024 में हुनान प्रांत में 1,000 मीट्रिक टन से अधिक के विशाल सोने के भंडार की खोज ने चीन को दुनिया का सबसे बड़ा सोना उत्पादक और उपभोक्ता देश बनाया। फिर भी, जून 2025 में 90 टन सोने की बिक्री के पीछे निम्नलिखित कारण हो सकते हैं:

  • युआन को स्थिर करना: चीन अपने युआन को वैश्विक व्यापार में मजबूत करना चाहता है। सोना बेचकर प्राप्त तरलता (लिक्विडिटी) का उपयोग युआन को स्थिर करने और डॉलर पर निर्भरता कम करने में किया जा सकता है।
  • मुनाफा कमाना: सोने की कीमतें हाल के वर्षों में रिकॉर्ड ऊंचाई पर हैं। चीन ने कम कीमत पर खरीदा हुआ सोना बेचकर मुनाफा कमाने की रणनीति अपनाई हो सकती है।
  • ब्रिक्स और डी-डॉलराइजेशन: ब्रिक्स देश (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, और नए सदस्य जैसे मिस्र, ईरान, यूएई) डी-डॉलराइजेशन की दिशा में काम कर रहे हैं। सोने की बिक्री और युआन में व्यापार को बढ़ावा देना इस रणनीति का हिस्सा हो सकता है।
  • आर्थिक स्थिरता: कुछ विश्लेषकों का मानना है कि चीन की अर्थव्यवस्था में मंदी (जैसे आभूषण मांग और उपभोक्ता विश्वास में कमी) के कारण सोना बेचकर आर्थिक स्थिरता बनाए रखने की कोशिश की जा रही है।

हालांकि, पीपल्स बैंक ऑफ चाइना ने 19 टन सोना खरीदकर अपने भंडार को 2,299 टन तक बढ़ाया, जो दर्शाता है कि चीन पूरी तरह सोना बेचने की नीति पर नहीं चल रहा, बल्कि एक रणनीतिक संतुलन बनाए रख रहा है।

यूएस बॉन्ड्स की बिक्री और डी-डॉलराइजेशन

चीन ने 2024 के पहले तिमाही में 53.3 बिलियन डॉलर के अमेरिकी ट्रेजरी और एजेंसी बॉन्ड्स बेचे, और 2021 से 2023 तक 300 बिलियन डॉलर की बिक्री की। जनवरी 2024 तक चीन के पास 797 बिलियन डॉलर के अमेरिकी ट्रेजरी सिक्योरिटीज थे, जो 2014 के 1.3 ट्रिलियन डॉलर से 40% कम है।

इसके पीछे निम्नलिखित कारण हैं:

  • जियोपॉलिटिकल तनाव: अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध और ताइवान, दक्षिण चीन सागर जैसे मुद्दों पर तनाव ने चीन को अमेरिकी संपत्तियों से दूरी बनाने के लिए प्रेरित किया।
  • सैंक्शन से बचाव: 2022 में रूस पर अमेरिकी सैंक्शंस के बाद, चीन और अन्य ब्रिक्स देश अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करना चाहते हैं ताकि सैंक्शन के जोखिम से बचा जा सके।
  • युआन का वैश्विककरण: चीन युआन को वैश्विक व्यापार में बढ़ावा दे रहा है। ब्राजील, अर्जेंटीना और सऊदी अरब जैसे देशों ने युआन में व्यापार शुरू किया है।

ब्रिक्स और डी-डॉलराइजेशन की रणनीति

ब्रिक्स अब 40% वैश्विक आबादी और 37.3% वैश्विक जीडीपी का प्रतिनिधित्व करता है, जो जी7 से अधिक है। 2024 और 2025 में इंडोनेशिया, मिस्र, ईरान, यूएई और इथियोपिया जैसे देशों के शामिल होने से ब्रिक्स की ताकत बढ़ी है। न्यू डेवलपमेंट बैंक (एनडीबी) और स्विफ्ट जैसे वैकल्पिक भुगतान तंत्र (जैसे चीन का सीआईपीएस) ब्रिक्स की डी-डॉलराइजेशन रणनीति का हिस्सा हैं।

  • सोने की भूमिका: ब्रिक्स देश (विशेष रूप से चीन, रूस, भारत) वैश्विक केंद्रीय बैंकों के 20% से अधिक सोने के भंडार रखते हैं। यह सोना एक संभावित ब्रिक्स करेंसी को समर्थन दे सकता है, जो डॉलर के प्रभुत्व को चुनौती दे।
  • ट्रंप की चेतावनी: डोनाल्ड ट्रंप ने ब्रिक्स देशों को चेतावनी दी है कि एक नई करेंसी लाने से अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंध प्रभावित हो सकते हैं। यह जियोपॉलिटिकल तनाव को दर्शाता है।

वैश्विक बाजारों पर प्रभाव

चीन की 90 टन सोने की बिक्री ने वैश्विक सोने की कीमतों को प्रभावित किया। मई 2025 में अमेरिका-चीन व्यापार तनाव में कमी के बाद सोने की कीमतें 3% गिरकर 3,224.34 डॉलर प्रति औंस हो गईं।

  • सोने की कीमतें: सोने की मांग में कमी (विशेष रूप से चीन में आभूषण मांग में 9% की गिरावट) और बिक्री से कीमतों पर दबाव बढ़ा। हालांकि, केंद्रीय बैंकों की लगातार खरीदारी (2023 में 1,037 टन) और भू-राजनीतिक जोखिमों से सोने की कीमतों में लंबी अवधि में उछाल की संभावना है।
  • डॉलर की स्थिति: डॉलर वैश्विक व्यापार में 90% हिस्सेदारी रखता है, लेकिन इसका विदेशी मुद्रा भंडार में हिस्सा 1999 के 71% से घटकर 2020 में 59% हो गया। ब्रिक्स की डी-डॉलराइजेशन नीतियां इसे और कम कर सकती हैं।
  • बॉन्ड मार्केट: चीन की बॉन्ड बिक्री से अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड्स बढ़ सकती हैं, जिससे वैश्विक उधारी लागत प्रभावित होगी।

भारत पर प्रभाव

भारत, ब्रिक्स का हिस्सा होने के साथ-साथ सोने का एक प्रमुख उपभोक्ता और भंडारक देश है। 2024 में भारत के पास 853.63 टन सोना था, जो वैश्विक केंद्रीय बैंक भंडार में आठवें स्थान पर है।

  • सोने की कीमतें: चीन की बिक्री से सोने की कीमतों में अल्पकालिक कमी भारत के खरीदारों (विशेष रूप से आभूषण क्षेत्र) के लिए फायदेमंद हो सकती है। हालांकि, भारत के मुद्रा भंडार में सोने की वैल्यू कम हो सकती है।
  • डी-डॉलराइजेशन और ब्रिक्स: भारत ने डी-डॉलराइजेशन और ब्रिक्स करेंसी की बात को स्पष्ट रूप से खारिज किया है। फिर भी, युआन में व्यापार बढ़ने से भारत-चीन व्यापार प्रभावित हो सकता है। भारत को अपनी नीतियों में संतुलन बनाना होगा ताकि अमेरिका और ब्रिक्स दोनों के साथ संबंध बने रहें।
  • आर्थिक प्रभाव: यदि वैश्विक सोने की कीमतें गिरती हैं, तो भारत के आयात बिल में कमी आ सकती है, लेकिन दीर्घकालिक निवेशकों को सतर्क रहना होगा क्योंकि भू-राजनीतिक जोखिम सोने की कीमतों को फिर से बढ़ा सकते हैं।

क्या चीन संकट में है

चीन की अर्थव्यवस्था में मंदी के संकेत हैं, जैसे आभूषण मांग में कमी (2024 की दूसरी तिमाही में 9% की गिरावट) और कमजोर उपभोक्ता विश्वास। हालांकि, सोने की बिक्री और बॉन्ड्स की बिक्री को संकट के बजाय रणनीतिक कदम के रूप में देखा जा रहा है। चीन युआन को वैश्विक मंच पर स्थापित करने, सैंक्शंस से बचने और ब्रिक्स के माध्यम से वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में अपनी स्थिति मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा है।

चीन का 90 टन सोना बेचना और अमेरिकी बॉन्ड्स की बिक्री डी-डॉलराइजेशन और ब्रिक्स की रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है। यह वैश्विक सोने की कीमतों को अल्पकाल में प्रभावित कर सकता है, लेकिन केंद्रीय बैंकों की खरीदारी और भू-राजनीतिक जोखिमों से दीर्घकालिक उछाल की संभावना बनी रहेगी। भारत के लिए, यह अल्पकालिक अवसर (सस्ता सोना) और दीर्घकालिक जोखिम (मुद्रा भंडार की वैल्यू में कमी) दोनों लाता है। भारत को ब्रिक्स और अमेरिका के बीच संतुलन बनाए रखना होगा ताकि आर्थिक और भू-राजनीतिक स्थिरता बनी रहे।

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