फ्रांस की मैरीटाइम इंटेलिजेंस कंपनी Unseen Labs ने हाल ही में बे ऑफ बंगाल में एक चीनी रिसर्च वेसल की मौजूदगी का खुलासा किया है। इस जहाज ने अपने ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम (AIS) को जानबूझकर बंद कर रखा था, जो समुद्री जहाजों की पहचान और ट्रैकिंग के लिए अनिवार्य है। यह रणनीति सैन्य या जासूसी गतिविधियों को छिपाने के लिए इस्तेमाल की जाती है। यह जहाज 16 दिन तक बे ऑफ बंगाल में चुपके से सर्वे करता रहा, जिसका किसी को पता नहीं चला। Unseen Labs ने रेडियो फ्रीक्वेंसी (RF) एमिशन के जरिए इसकी मौजूदगी का पता लगाया। यह घटना भारत की समुद्री सुरक्षा के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
चीनी जहाजों की संदिग्ध गतिविधियां
चीनी रिसर्च वेसल्स, जो बाहरी तौर पर वैज्ञानिक शोध के लिए तैनात किए जाते हैं, अक्सर सैन्य और जासूसी उद्देश्यों के लिए काम करते हैं। ये जहाज समुद्री तल (सी फ्लोर) की मैपिंग, एकॉस्टिक एनवायरनमेंट एनालिसिस, और सबमरीन ट्रांजिट कॉरिडोर की पहचान करते हैं। बे ऑफ बंगाल और अरब सागर में इनकी बढ़ती मौजूदगी भारत के लिए खतरे की घंटी है। ये जहाज भारत के मिसाइल टेस्टिंग रेंज, जैसे अब्दुल कलाम द्वीप, और नौसैनिक ठिकानों की निगरानी कर सकते हैं। इसके अलावा, सिग्नल्स और टेलीमेट्री डेटा को इंटरसेप्ट कर भारत की बैलिस्टिक मिसाइल विकास योजनाओं की जानकारी हासिल करने की कोशिश की जा सकती है।
मलक्का जलडमरूमध्य और चीनी रणनीति
मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca) चीनी व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन भारत की नौसैनिक मौजूदगी इसे नियंत्रित करने की क्षमता रखती है। इसे “मलक्का डायलेमा” कहा जाता है, क्योंकि चीन इस जलमार्ग पर निर्भर है और भारत इसे ब्लॉक कर सकता है। अपनी इस कमजोरी को दूर करने के लिए चीन ने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) शुरू किया, जिसमें पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट और श्रीलंका के हंबनटोटा पोर्ट जैसे प्रोजेक्ट शामिल हैं। हालांकि, ये प्रोजेक्ट्स आर्थिक रूप से विफल रहे हैं। उदाहरण के लिए, चीन ने पाकिस्तान में 65 बिलियन डॉलर का निवेश किया, लेकिन ग्वादर पोर्ट अभी तक पूरी तरह ऑपरेशनल नहीं है।
श्रीलंका और मालदीव में चीनी प्रभाव
श्रीलंका और मालदीव में चीन का बढ़ता प्रभाव भारत के लिए चिंता का कारण है। श्रीलंका 2008 से चीनी कर्ज के जाल में फंस गया और 2017 में हंबनटोटा पोर्ट को 99 साल की लीज पर चीन को सौंपना पड़ा। मालदीव में भी प्रो-बीजिंग सरकार ने चीनी रिसर्च वेसल्स को अनुमति दी, जैसे कि फरवरी और मार्च 2024 में जियांग यांग होंग 3 और मई 2025 में डा यांग हाउ 2 की मौजूदगी। इन जहाजों को भारत ने आपत्ति दर्ज की, लेकिन श्रीलंका और मालदीव ने इसे नजरअंदाज किया।
भारत की समुद्री ताकत और जवाबी कार्रवाई
भारत की नौसेना इंडियन ओशन रीजन (IOR) में एक प्रमुख शक्ति है। ऑपरेशन सिंदूर (2023) में भारत ने पाकिस्तान और चीन की नौसैनिक गतिविधियों को नाकाम किया था। भारत का एयर डिफेंस सिस्टम, जैसे कि PL-15 मिसाइल को हरियाणा में मार गिराना, इसकी ताकत का सबूत है। भारत के पास P-8I जैसे उन्नत सर्विलांस विमान और मानवरहित हवाई वाहन (UAV) हैं, जो समुद्री निगरानी में सक्षम हैं।
भारत ने चीनी जहाजों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए डिप्लोमेटिक और सैन्य कदम उठाए हैं। रॉ (RAW) और नौसेना ने चीनी जहाजों की गतिविधियों को ट्रैक करने के लिए शैडो ऑपरेशंस शुरू किए हैं। भारत ने श्रीलंका और मालदीव में चीनी प्रभाव को कम करने के लिए डिप्लोमेटिक प्रोटेस्ट दर्ज किए हैं। साथ ही, भारत अफ्रीका में अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है, जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया यात्राएं (नामीबिया, घाना) चीनी प्रभाव का मुकाबला करने की रणनीति का हिस्सा हैं।
चीनी नौसेना और स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स
चीन की स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स रणनीति इंडियन ओशन में भारत को घेरने की कोशिश है। जिबूती में चीन का एकमात्र नौसैनिक अड्डा है, और वह अफ्रीका में अपने प्रभाव को बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। चीन ने पाकिस्तान को सबमरीन, युद्धपोत और मिसाइल ट्रैकिंग जहाज प्रदान किए हैं, जिससे दोनों देशों की नौसैनिक साझेदारी मजबूत हुई है। हालांकि, ऑन-पेपर चीन की नौसेना भारत से मजबूत दिखती है, लेकिन ऑपरेशन सिंदूर ने साबित किया कि भारत की रणनीतिक और तकनीकी क्षमता इसे पीछे छोड़ सकती है।
भारत के लिए रणनीतिक चुनौतियां
चीनी रिसर्च वेसल्स की गतिविधियां भारत के लिए कई चुनौतियां पेश करती हैं। ये जहाज समुद्री तल की मैपिंग, एकॉस्टिक एनालिसिस और सबमरीन कॉरिडोर की पहचान कर भारत की रणनीतिक योजनाओं को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसके अलावा, श्रीलंका और मालदीव में प्रो-बीजिंग सरकारों का रुख भारत के लिए डिप्लोमेटिक चुनौती है। भारत इन देशों में सैन्य हस्तक्षेप नहीं कर सकता, लेकिन डिप्लोमेटिक दबाव और क्षेत्रीय सहयोगियों (जैसे ग्रीस, साइप्रस, इजराइल) के साथ गठजोड़ के जरिए जवाब दे रहा है।
निष्कर्ष
बे ऑफ बंगाल में चीनी रिसर्च वेसल्स की गतिविधियां भारत की समुद्री सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा हैं। इन जहाजों की जासूसी गतिविधियां, विशेष रूप से AIS बंद करके चुपके से सर्वे करना, भारत की नौसैनिक रणनीति और मिसाइल टेस्टिंग रेंज को निशाना बना सकती हैं। भारत की नौसेना और खुफिया एजेंसियां इसे ट्रैक करने में सक्षम हैं, लेकिन श्रीलंका और मालदीव में चीनी प्रभाव एक बड़ी चुनौती है। भारत को अपनी समुद्री निगरानी और क्षेत्रीय कूटनीति को और मजबूत करना होगा। सवाल यह है कि क्या भारत को मलक्का जलडमरूमध्य में अपनी मौजूदगी और बढ़ानी चाहिए? अपनी राय कमेंट में साझा करें।