भारत अब केवल एक इंडो-पैसिफिक शक्ति नहीं है, बल्कि उसकी मौजूदगी कॉकस, ब्लैक सी, और एजियन क्षेत्र तक फैल चुकी है। ग्रीस, साइप्रस, इजराइल और आर्मेनिया के साथ भारत की रक्षा साझेदारी तुर्की के लिए एक सीधी चुनौती बन रही है। तुर्की, जो खुद को इस्लामिक दुनिया का नेता बनाना चाहता है, भारत की इस सक्रिय कूटनीति से परेशान है। खासकर ऑपरेशन सिंदूर के बाद, तुर्की और पाकिस्तान का गठजोड़ और अजरबैजान के साथ उनकी नजदीकी भारत के लिए चिंता का विषय है। इसके जवाब में भारत एक मेडिटेरेनियन अलायंस की दिशा में काम कर रहा है, जिसमें ग्रीस, साइप्रस, इजराइल और आर्मेनिया को शामिल कर तुर्की के प्रभाव को संतुलित किया जा सकता है।
तुर्की-पाकिस्तान का नेक्सस और भारत की प्रतिक्रिया
तुर्की ने 2023 में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान को ड्रोन और अन्य सैन्य सहायता प्रदान की थी, जिसे भारत ने गंभीरता से लिया। तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तईप एर्दोगन पिछले एक दशक से कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान का समर्थन करते रहे हैं और इस्लामिक दुनिया में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए धार्मिक और सॉफ्ट पावर का उपयोग कर रहे हैं। 2019 में अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद तुर्की ने संयुक्त राष्ट्र में भारत विरोधी बयान दिए। इसके अलावा, तुर्की की खुफिया एजेंसी MIT और NGO जैसे IHH नेपाल में मस्जिदों और मदरसों के निर्माण के जरिए भारत विरोधी नेटवर्क को बढ़ावा दे रहे हैं।
भारत ने इसका जवाब अपनी कूटनीतिक और सैन्य ताकत से देना शुरू किया है। भारत ने तुर्की के क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वियों—ग्रीस, साइप्रस, और आर्मेनिया—के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाया है। हाल ही में भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह की ग्रीस यात्रा और संभावित मिसाइल डील इसका प्रमाण है। भारत ने ग्रीस को निर्भय लॉन्ग-रेंज क्रूज मिसाइल और साइप्रस को सरफेस-टू-एयर मिसाइल की पेशकश की है, जिससे तुर्की पर दबाव बढ़ गया है।
तुर्की-साइप्रस और तुर्की-ग्रीस विवाद
तुर्की और साइप्रस के बीच विवाद 1974 से चला आ रहा है, जब तुर्की ने उत्तरी साइप्रस पर कब्जा कर लिया और वहां तुर्की गणराज्य उत्तरी साइप्रस (TRNC) की स्थापना की। यह क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त नहीं है, लेकिन तुर्की का वहां सैन्य नियंत्रण है। साइप्रस की अधिकांश आबादी ग्रीक साइप्रियट्स की है, जो ग्रीस से सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रूप से जुड़े हैं। तुर्की और ग्रीस के बीच एजियन सागर में समुद्री सीमा और संसाधनों (तेल और गैस) को लेकर भी लंबे समय से विवाद है। तुर्की का दावा है कि एजियन सागर के कई द्वीप उसके हैं, जबकि ग्रीस इन पर नियंत्रण रखता है।
भारत ने इस स्थिति का फायदा उठाकर ग्रीस और साइप्रस के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाया है। 2023 में भारत और ग्रीस ने डिफेंस मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) पर हस्ताक्षर किए, और ग्रीस ने भारत की तरंग शक्ति ड्रिल और INIOCHOS मल्टीनेशनल एयर एक्सरसाइज में हिस्सा लिया। दोनों देशों के पास राफेल फाइटर जेट्स हैं, जिससे सैन्य सहयोग और मजबूत हुआ है। भारत ने साइप्रस को भी स्वतंत्रता के बाद से समर्थन दिया है और 1974 के तुर्की आक्रमण की निंदा की थी।
मेडिटेरेनियन अलायंस की जरूरत
मेडिटेरेनियन अलायंस में ग्रीस, साइप्रस, इजराइल और आर्मेनिया को शामिल कर भारत तुर्की और उसके सहयोगियों (पाकिस्तान और अजरबैजान) के प्रभाव को संतुलित कर सकता है। इजराइल पहले से ही भारत का मजबूत रक्षा साझेदार है, और आर्मेनिया के साथ हाल के वर्षों में भारत का सैन्य सहयोग बढ़ा है। आर्मेनिया को भारत से पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर और अन्य हथियार मिले हैं, जो अजरबैजान और तुर्की के लिए चिंता का विषय है। इस अलायंस से भारत मेडिटेरेनियन क्षेत्र में अपनी रणनीतिक उपस्थिति को मजबूत कर सकता है और तुर्की को चार मोर्चों (ग्रीस, साइप्रस, इजराइल, आर्मेनिया) पर चुनौती दे सकता है।
भारत की ताकत और कूटनीति
भारत की ताकत उसकी सैन्य, आर्थिक और डायस्पोरा शक्ति में निहित है। भारत अफ्रीका में अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावशाली है, जहां भारतीय व्यवसायों का दबदबा है। जीसीसी (गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल) में भारत का प्रभाव और IMEC (इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप कॉरिडोर) में ग्रीस और साइप्रस की भूमिका भारत की रणनीतिक स्थिति को मजबूत करती है। भारत हमेशा शांति और सहयोग की नीति पर चलता है, लेकिन तुर्की और पाकिस्तान के भारत विरोधी कदमों ने भारत को आक्रामक रुख अपनाने के लिए मजबूर किया है।
2023 में तुर्की में आए भूकंप के दौरान भारत ने सबसे पहले NDRF टीमें भेजीं और हजारों लोगों की जान बचाई। इसके बावजूद तुर्की ने पाकिस्तान का समर्थन जारी रखा, जिसे भारत ने एहसान फरामोशी माना। अब भारत ने तुर्की के पड़ोसियों को मजबूत करने की रणनीति अपनाई है, जिसमें ग्रीस और साइप्रस को हथियारों और तकनीकी सहायता देना शामिल है।
तुर्की के लिए चुनौतियां
तुर्की की अर्थव्यवस्था और सैन्य शक्ति भारत की तुलना में कमजोर है। भारत की निर्भय मिसाइल, जिसकी रेंज 1,000 किलोमीटर है, और अन्य स्वदेशी हथियार तुर्की के लिए खतरा बन सकते हैं। तुर्की को ग्रीस और साइप्रस के साथ समुद्री विवाद और आर्मेनिया-अजरबैजान संघर्ष में भारत की बढ़ती भूमिका से दबाव का सामना करना पड़ रहा है। अगर भारत मेडिटेरेनियन क्षेत्र में सैन्य अड्डे स्थापित करता है, तो तुर्की की स्थिति और कमजोर हो सकती है।
मेडिटेरेनियन अलायंस भारत की रणनीतिक नीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है। ग्रीस, साइप्रस, इजराइल और आर्मेनिया के साथ मिलकर भारत तुर्की-पाकिस्तान-अजरबैजान नेक्सस को प्रभावी ढंग से जवाब दे सकता है। तुर्की की भारत विरोधी गतिविधियां, विशेष रूप से नेपाल में मस्जिदों और मदरसों की फंडिंग, भारत की सुरक्षा के लिए खतरा हैं। भारत की कूटनीति और सैन्य ताकत इस चुनौती का जवाब देने में सक्षम है। सवाल यह है कि क्या भारत को तुर्की के खिलाफ और आक्रामक रुख अपनाना चाहिए? अपनी राय कमेंट में साझा करें।