मद्रास हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि आवासीय क्षेत्रों में धार्मिक गतिविधियाँ जैसे भजन-कीर्तन या नाम संकीर्तनम करने के लिए अब जिला कलेक्टर से पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य होगा। न्यायमूर्ति आनंद वेंकटेश की खंडपीठ ने यह फैसला एक जनहित याचिका पर सुनाते हुए दिया, जिसमें आवासीय इलाकों में हो रहे धार्मिक कार्यक्रमों से पड़ोसियों को हो रही परेशानी को लेकर शिकायत की गई थी।
फैसले की मुख्य बातें:
- अनुमति अनिवार्य: अब किसी भी आवासीय परिसर में धार्मिक सभा या भजन-कीर्तन करने से पहले जिला प्रशासन से लिखित अनुमति लेनी होगी।
- सभी धर्मों पर समान रूप से लागू: यह नियम सभी धर्मों के लोगों पर समान रूप से लागू होगा, किसी विशेष समुदाय को टारगेट नहीं किया गया है।
- शांति भंग न करने का निर्देश: कोर्ट ने कहा कि “शांति और मौन सबसे बड़ी प्रार्थना है” और धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार दूसरों की शांति भंग करने का लाइसेंस नहीं देता।
क्यों आया यह फैसला?
यह मामला मद्रास हाईकोर्ट में तब पहुँचा जब चेन्नई के एक निवासी प्रकाश रामचंद्रन ने शिकायत की कि उनके पड़ोस में ‘ग्लोबल ऑर्गेनाइजेशन फॉर डिविनिटी’ नामक संस्था ने एक आवासीय भवन में अपना कार्यालय खोलकर नियमित रूप से ऊँची आवाज़ में धार्मिक कार्यक्रम आयोजित करना शुरू कर दिया। इससे उनकी दिनचर्या प्रभावित हो रही थी और शांति भंग हो रही थी।
कोर्ट की टिप्पणियाँ:
- मौलिक अधिकारों की सीमा: कोर्ट ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) असीमित अधिकार नहीं देता। जब एक व्यक्ति की धार्मिक गतिविधियाँ दूसरे के शांतिपूर्ण जीवन (अनुच्छेद 21) में बाधा डालें, तो संतुलन बनाना ज़रूरी है।
- एक व्यक्ति की शिकायत भी महत्वपूर्ण: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी मामले में संज्ञान लेने के लिए यह ज़रूरी नहीं कि पूरा मोहल्ला शिकायत करे। एक व्यक्ति की गंभीर आपत्ति भी कार्रवाई का आधार बन सकती है।
क्या है नाम संकीर्तनम?
नाम संकीर्तनम या भजन-कीर्तन एक धार्मिक प्रथा है जिसमें समूह में ईश्वर के नामों का जाप या भक्ति गीत गाए जाते हैं। आमतौर पर इसमें वाद्ययंत्रों और लाउडस्पीकर का उपयोग होता है, जो आस-पास के लोगों के लिए परेशानी का कारण बन सकता है।
सामाजिक प्रतिक्रिया
इस फैसले को लेकर समाज में मिश्रित प्रतिक्रियाएँ हैं:
- समर्थन में: जो लोग शोर-शराबे और अवांछित धार्मिक गतिविधियों से परेशान हैं, उन्होंने इस फैसले का स्वागत किया है।
- आलोचना: कुछ धार्मिक संगठनों का मानना है कि यह फैसला धार्मिक स्वतंत्रता को सीमित करता है।
मद्रास हाईकोर्ट का यह फैसला व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक शांति के बीच संतुलन बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह स्पष्ट करता है कि धार्मिक प्रथाएँ दूसरों के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं कर सकतीं।
