
कोलकाता, 4 जून 2025: पश्चिम बंगाल में मई 2024 में कलकत्ता हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 2010 के बाद जारी किए गए करीब 12 लाख ओबीसी प्रमाणपत्रों को रद्द कर दिया था। इस फैसले ने राज्य में बड़ा विवाद खड़ा कर दिया, क्योंकि इससे नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण का लाभ लेने वाले लाखों लोगों का भविष्य अनिश्चित हो गया। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जिन लोगों ने इन प्रमाणपत्रों के आधार पर पहले ही नौकरी हासिल कर ली है, उनकी नौकरी पर कोई असर नहीं पड़ेगा। इस मामले ने सामाजिक, राजनीतिक और सांप्रदायिक स्तर पर तीखी बहस छेड़ दी, जिसके बाद पश्चिम बंगाल सरकार ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने भी हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए कुछ अहम टिप्पणियां कीं।
हाई कोर्ट का फैसला: ओबीसी प्रमाणपत्र क्यों रद्द किए गए?
कलकत्ता हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें जस्टिस तपब्रता चक्रवर्ती और जस्टिस राजशेखर मंथा शामिल थे, ने 22 मई 2024 को यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने पाया कि 2010 के बाद ओबीसी सूची में शामिल की गईं 77 जातियों की पहचान बिना किसी वैज्ञानिक डेटा और सामाजिक-शैक्षिक पिछड़ेपन के प्रमाण के की गई थी। कोर्ट ने कहा कि ओबीसी दर्जा देने की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 15(4) और 16(4) का उल्लंघन करती है, जो सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण देने की शर्तें तय करते हैं।
इन 77 जातियों में से 75 मुस्लिम समुदाय से थीं, जिसके चलते मामला धार्मिक दृष्टिकोण से भी विवादास्पद बन गया। कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि ओबीसी दर्जा देने में “धर्म ही एकमात्र आधार” प्रतीत होता है, जो संवैधानिक भावना के खिलाफ है। कोर्ट ने यह भी कहा कि पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग ने बिना उचित सर्वेक्षण और डेटा के इन जातियों को ओबीसी सूची में शामिल किया, जो प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करता है। इसके चलते 2010 से 2024 के बीच जारी किए गए सभी ओबीसी प्रमाणपत्रों को अवैध घोषित कर दिया गया।
सांप्रदायिक और राजनीतिक विवाद
इस फैसले ने पश्चिम बंगाल में तीव्र प्रतिक्रिया उत्पन्न की। प्रभावित वर्गों ने सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन किए और ओबीसी दर्जा बहाल करने की मांग की। उनका कहना था कि इससे उनकी नौकरियों और शिक्षा के अवसर छिन गए हैं। मामला सांप्रदायिक रंग लेने लगा, क्योंकि रद्द की गई 77 जातियों में से 75 मुस्लिम समुदाय से थीं। विपक्षी दलों, खासकर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने इसे तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) सरकार की “वोट बैंक की राजनीति” करार दिया। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि ममता बनर्जी ने बिना किसी सर्वेक्षण के 118 मुस्लिम समुदायों को ओबीसी आरक्षण दिया, जो संविधान के खिलाफ है।
दूसरी ओर, ममता बनर्जी ने हाई कोर्ट के फैसले को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और कहा कि वह इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगी। उन्होंने इसे “बीजेपी की साजिश” करार देते हुए कहा कि ओबीसी आरक्षण जारी रहेगा। ममता ने यह भी तर्क दिया कि यह प्रक्रिया विधानसभा और मंत्रिमंडल से पारित हुई थी, और इसे रद्द करना गलत है।
सुप्रीम कोर्ट का रुख: धर्म आधारित आरक्षण असंवैधानिक
पश्चिम बंगाल सरकार ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने कई सुनवाई के बाद हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने 10 दिसंबर 2024 को सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि “आरक्षण का आधार धर्म नहीं हो सकता।” कोर्ट ने कहा कि ओबीसी दर्जा देने के लिए सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक पिछड़ेपन का वैज्ञानिक डेटा जरूरी है, जो इस मामले में मौजूद नहीं था।
सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार को तीन महीने के भीतर एक नया सर्वेक्षण पूरा करने का निर्देश दिया। मार्च 2025 में राज्य सरकार ने कोर्ट को सूचित किया कि यह सर्वेक्षण जून 2025 तक पूरा हो जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि ओबीसी सूची में जातियों को शामिल करने से पहले उनकी सामाजिक और शैक्षिक स्थिति का आकलन करना अनिवार्य है, और यह प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए।
सामाजिक प्रभाव और भविष्य
इस फैसले का सबसे बड़ा प्रभाव उन लोगों पर पड़ा, जो ओबीसी प्रमाणपत्रों के आधार पर नौकरी या शिक्षा के अवसरों की तैयारी कर रहे थे। कई छात्रों और नौकरी चाहने वालों ने इसे अपने भविष्य पर एक बड़ा झटका बताया। पश्चिम बंगाल में ओबीसी आबादी करीब 39% है, और यह समुदाय राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस फैसले ने सामाजिक समानता और आरक्षण की नीति पर एक नई बहस छेड़ दी है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह सुनिश्चित किया कि जिन लोगों ने पहले ही इन प्रमाणपत्रों के आधार पर नौकरियां हासिल कर ली हैं, उनकी नौकरियां सुरक्षित रहेंगी। अब नया सर्वेक्षण पूरा होने के बाद ही यह तय होगा कि ओबीसी सूची में कौन सी जातियां शामिल होंगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रक्रिया भविष्य में अधिक पारदर्शी और संवैधानिक होगी, लेकिन इसके लिए राज्य सरकार को ठोस और वैज्ञानिक डेटा जुटाने की जरूरत होगी।
