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भारत में फर्जी मेडिकल कॉलेजों का खेल: पैसे से खरीदे जा रहे डॉक्टरों के डिग्री

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Last updated: July 10, 2025 6:49 pm
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The game of fake medical colleges in India: Doctors' degrees are being bought with money
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भारत के सरकारी मेडिकल कॉलेजों से पढ़े डॉक्टरों की योग्यता को पूरी दुनिया मानती है और अमेरिका जैसे देशों में हमारे डॉक्टरों की संख्या उल्लेखनीय है, लेकिन निजी मेडिकल कॉलेजों में चल रही गड़बड़ियां चिंता का विषय हैं। सीबीआई ने हाल ही में 40 ऐसे मेडिकल कॉलेजों का भंडाफोड़ किया है, जहां नकली मरीज, नकली नर्स, नकली प्रोफेसर और नकली लैब बनाकर निरीक्षण के दौरान धोखाधड़ी की गई। इन कॉलेजों में नकली मेडिकल रिपोर्ट और पहले से तय किए गए निरीक्षण रिपोर्ट के आधार पर मान्यता दी जा रही थी। निरीक्षकों को नकद और हवाला के जरिए लाखों रुपये की रिश्वत दी गई, ताकि वे इन नकली सेटअप को पास कर दें।

ऐसा ही एक मामला छत्तीसगढ़ के श्री रावतपुरा सरकार इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड रिसर्च का है। इस संस्थान को रावतपुरा सरकार नामक एक प्रभावशाली बाबा द्वारा संचालित किया जाता है, जिनका मध्य प्रदेश और अन्य क्षेत्रों में काफी राजनीतिक प्रभाव है। कई बड़े नेता उनके प्रभाव में हैं, और इस संस्थान ने राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) से मान्यता पाने के लिए 55 लाख रुपये की रिश्वत दी। सीबीआई की जांच में पता चला कि इस कॉलेज में न तो पर्याप्त शिक्षक थे और न ही उचित बुनियादी ढांचा। सब कुछ एक फिल्मी सेट की तरह सजाया गया था, जो निरीक्षण के बाद हटा लिया जाता था।

भारत में नकली मेडिकल कॉलेजों का घोटाला: चिकित्सा शिक्षा पर सवाल

यह घोटाला केवल एक संस्थान तक सीमित नहीं है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश जैसे आठ राज्यों में ऐसे 40 कॉलेजों की पहचान की गई है। इनमें से कई कॉलेजों में नकली मरीजों के बेड, नकली लैब और किराए पर लाई गई मशीनें थीं, जो केवल निरीक्षण के लिए रखी जाती थीं। सीबीआई का अनुमान है कि प्रति कॉलेज 30 से 35 करोड़ रुपये तक की रिश्वत दी गई। यह राशि नकद और हवाला के जरिए दी गई, जिसमें कई प्रभावशाली लोग शामिल हैं।

इस घोटाले में कई बड़े नाम सामने आए हैं। मध्य प्रदेश के इंडेक्स मेडिकल कॉलेज और एलएनसीटी मेडिकल कॉलेज, भोपाल; छत्तीसगढ़ के गीतांजलि मेडिकल कॉलेज, रायपुर; तेलंगाना के फादर कोलंबो इंस्टीट्यूट; और आंध्र प्रदेश के गायत्री विद्या परिषद इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थकेयर जैसे संस्थानों के नाम जांच में शामिल हैं। इसके अलावा, दिल्ली में एनएमसी की फाइलें पास कराने वाले दलालों का एक नेटवर्क भी पकड़ा गया है। इसमें पूर्व स्वास्थ्य मंत्रियों, नीति आयोग के अधिकारियों, गृह राज्य मंत्रियों और कई आईएएस-आईपीएस अधिकारियों के नाम सामने आए हैं। उदाहरण के लिए, रावतपुरा सरकार कॉलेज के प्रतिनिधि अतुल कुमार तिवारी और इंडेक्स मेडिकल कॉलेज के निदेशक सुरेश सिंह भदौरिया जैसे लोग इस घोटाले में शामिल पाए गए हैं।

यह कोई नई कहानी नहीं है। वर्षों से यह सिलसिला चल रहा है। एक वरिष्ठ पत्रकार ने बताया था कि दिल्ली-एनसीआर के एक मेडिकल कॉलेज में निरीक्षण के लिए नकली सेटअप तैयार किया जाता था। यह घोटाला 2013-2015 के बीच हुए मेडिकल प्रवेश परीक्षा (पीएमटी) घोटाले से भी जुड़ा है, जिसमें नकली उम्मीदवारों को बैठाया गया और सीटों की खरीद-फरोख्त हुई। उज्जैन के आरकेडीएफ मेडिकल कॉलेज (2014), फर्रुखाबाद और महाराष्ट्र के मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया निरीक्षण घोटाले (2017), बिहार के नकली मेडिकल कॉलेज (2020) और तमिलनाडु के नीट सीट घोटाले (2021) जैसे मामले भी सामने आ चुके हैं। दिल्ली-एनसीआर में नकली मेडिकल डिग्रियां बेचने वाले गिरोह भी पकड़े गए हैं।

इस घोटाले का सबसे दुखद पहलू यह है कि इससे निकलने वाले डॉक्टरों की योग्यता संदिग्ध है। ऐसे कॉलेजों में न तो व्यावहारिक प्रशिक्षण होता है और न ही उचित शिक्षक। एक अच्छा डॉक्टर बनने के लिए एम्स जैसे संस्थानों में इंटर्नशिप और आपातकालीन कक्षों में लंबे समय तक ड्यूटी जरूरी होती है। लेकिन जब सब कुछ नकली हो, तो ये डॉक्टर क्या सीखेंगे? यह स्थिति न केवल मरीजों के लिए खतरनाक है, बल्कि चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता पर भी सवाल उठाती है।

इसके पीछे एक बड़ा कारण सरकारी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में दाखिला प्रक्रिया को जटिल करना है। केंद्रीय विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा (सीयूईटी) जैसी प्रणालियों ने सरकारी संस्थानों में दाखिले को मुश्किल बना दिया है। निजी कॉलेज इस मौके का फायदा उठाकर अपनी सीटें भरते हैं, जिसके लिए वे मोटी फीस वसूलते हैं। इससे प्रतिभाशाली छात्र सरकारी कॉलेजों में दाखिला लेने के बजाय निजी संस्थानों में जाना मजबूर हो जाते हैं, जहां कई बार शिक्षा की गुणवत्ता संदिग्ध होती है।

यह घोटाला सिर्फ शिक्षा प्रणाली की विफलता नहीं, बल्कि नेताओं और प्रभावशाली लोगों की मिलीभगत का परिणाम है। जब तक हम अपने नेताओं को आलोचनात्मक नजरिए से नहीं देखेंगे और उनकी जवाबदेही तय नहीं करेंगे, तब तक ऐसी व्यवस्था चलती रहेगी। भारत में चिकित्सा के क्षेत्र में कभी सुष्रुत जैसे महान वैज्ञानिक हुए, जिन्होंने ढाई हजार साल पहले राइनोप्लास्टी जैसी जटिल सर्जरी की। लेकिन आज हमारी शिक्षा प्रणाली और चिकित्सा क्षेत्र कुछ स्वार्थी लोगों के हाथों में बिक चुका है। यह घोटाला हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हमारी स्वास्थ्य प्रणाली वाकई सुरक्षित है?

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