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निमिषा प्रिया की फांसी टली: यमन में केरल की नर्स को मिली राहत

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Last updated: July 15, 2025 4:59 pm
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निमिषा प्रिया केस: ताजा अपडेट

केरल की नर्स निमिषा प्रिया, जिन्हें यमन में 2017 में एक यमनी नागरिक तलाल अब्दो महदी की हत्या के लिए मौत की सजा सुनाई गई थी, उनकी फांसी को फिलहाल टाल दिया गया है। 16 जुलाई, 2025 को निर्धारित इस फांसी को यमनी अधिकारियों ने स्थगित कर दिया है, जो निमिषा, उनके परिवार और समर्थकों के लिए एक बड़ी राहत की खबर है।

मामले का बैकग्राउंड

निमिषा प्रिया, जो केरल के पलक्कड़ जिले की रहने वाली हैं, 2008 में नर्स के रूप में काम करने के लिए यमन गई थीं। 2011 में उन्होंने अपने पति और बेटी के साथ यमन में रहना शुरू किया, लेकिन आर्थिक तंगी और गृहयुद्ध के कारण उनका परिवार भारत लौट गया। निमिषा ने यमन में रहकर तलाल अब्दो महदी के साथ मिलकर एक क्लिनिक शुरू किया। आरोप है कि तलाल ने निमिषा का पासपोर्ट जब्त कर लिया और उन्हें प्रताड़ित किया। 2017 में, निमिषा ने अपना पासपोर्ट वापस पाने के लिए तलाल को बेहोशी का इंजेक्शन दिया, लेकिन गलत डोज के कारण उनकी मौत हो गई। इसके बाद, निमिषा ने एक अन्य यमनी नर्स की मदद से तलाल के शव को टुकड़ों में काटकर पानी की टंकी में छिपाने की कोशिश की। यमन छोड़ने की कोशिश के दौरान उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

कानूनी प्रक्रिया और सजा

निमिषा को 2018 में यमन की एक स्थानीय अदालत ने हत्या के आरोप में मौत की सजा सुनाई। इस फैसले को 2020 में तीन बार दोहराया गया और 2023 में यमन के सुप्रीम ज्यूडिशियल काउंसिल ने इसे बरकरार रखा। राष्ट्रपति से माफी की गुहार भी खारिज हो गई। इसके बाद, निमिषा के पास एकमात्र विकल्प बचा था—शरिया कानून के तहत ‘ब्लड मनी’ (दिया) के जरिए पीड़ित परिवार से माफी।

ब्लड मनी और बचाव के प्रयास

‘सेव निमिषा प्रिया इंटरनेशनल एक्शन काउंसिल’ नामक एक समूह ने 2020 से निमिषा को बचाने के लिए प्रयास शुरू किए। इस समूह ने क्राउडफंडिंग के जरिए 1 मिलियन डॉलर (लगभग 8.6 करोड़ रुपये) जुटाए और यमनी सामाजिक कार्यकर्ता सैमुअल जेरोम भास्करन को तलाल के परिवार से बातचीत के लिए नियुक्त किया। निमिषा की मां, प्रेमा कुमारी, भी यमन गईं और पीड़ित परिवार से माफी की गुहार लगाई, लेकिन तलाल के परिवार ने ब्लड मनी स्वीकार करने से इनकार कर दिया, इसे अपने सम्मान के खिलाफ बताते हुए।

फांसी टलने की वजह

15 जुलाई, 2025 को यमनी अधिकारियों ने निमिषा की फांसी को स्थगित करने का फैसला किया। यह स्थगन भारत सरकार, यमन में भारतीय मिशन से जुड़े दो यमनी नागरिकों, और सैमुअल जेरोम भास्करन के संयुक्त प्रयासों का नतीजा है। इसके अलावा, केरल के प्रभावशाली सुन्नी मुस्लिम नेता और ‘ग्रैंड मुफ्ती ऑफ इंडिया’ कंथापुरम ए.पी. अबूबकर मुसलियार ने यमन के धार्मिक नेताओं और तलाल के परिवार से बातचीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यमन के धमार में तलाल के परिवार के एक सदस्य, जो होदेदा स्टेट कोर्ट के चीफ जस्टिस और यमनी शूरा काउंसिल के सदस्य हैं, ने इस चर्चा में हिस्सा लिया। शेख हबीब उमर बिन हाफिज के सुन्नी समूह के प्रभाव ने भी इस स्थगन में मदद की।

भारत सरकार और सुप्रीम कोर्ट की भूमिका

भारत सरकार ने शुरू से ही इस मामले में सक्रियता दिखाई। 14 जुलाई, 2025 को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने कहा कि भारत सरकार ने हर संभव कोशिश की, लेकिन यमन में हूती नियंत्रित क्षेत्रों में भारत की कोई राजनयिक मौजूदगी नहीं होने के कारण सीमित विकल्प हैं। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 18 जुलाई को निर्धारित की है। सरकार ने स्थानीय जेल अधिकारियों और अभियोजक कार्यालय के साथ निरंतर संपर्क बनाए रखा, जिसके परिणामस्वरूप यह स्थगन संभव हुआ।

केरल सरकार और सामाजिक समर्थन

केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने इस स्थगन को ‘सुखद और आशाजनक’ बताया और कंथापुरम और एक्शन काउंसिल की कोशिशों की सराहना की। उन्होंने उम्मीद जताई कि ये प्रयास निमिषा को पूर्ण न्याय दिलाने में सफल होंगे। निमिषा के पति और मां ने भी इस स्थगन पर राहत जताई और सभी सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया।

आगे की राह

हालांकि निमिषा की फांसी को टाल दिया गया है, लेकिन इसे रद्द नहीं किया गया है। यमन के शरिया कानून के तहत, तलाल के परिवार से माफी और ब्लड मनी स्वीकार करना ही निमिषा को बचाने का एकमात्र रास्ता है। भारत सरकार, धार्मिक नेता, और सामाजिक संगठन इस दिशा में बातचीत जारी रखे हुए हैं। निमिषा के परिवार और समर्थकों को उम्मीद है कि यह स्थगन एक स्थायी समाधान की ओर ले जाएगा।

निमिषा प्रिया की फांसी का टलना उनके परिवार और समर्थकों के लिए एक बड़ी राहत है। भारत सरकार, धार्मिक नेताओं, और सामाजिक कार्यकर्ताओं के संयुक्त प्रयासों ने इस मामले में नई उम्मीद जगाई है। हालांकि, चुनौतियां अभी बाकी हैं, और ब्लड मनी के जरिए माफी ही निमिषा की जान बचा सकती है। इस मामले ने युद्धग्रस्त देशों में भारतीय कामगारों की सुरक्षा के सवाल को भी सामने ला दिया है। आप इस मामले पर क्या सोचते हैं? अपनी राय साझा करें।

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