कुरुक्षेत्र के आरटीआई कार्यकर्ता पंकज ने जन स्वास्थ्य विभाग से टेंडर, कर्मचारियों और खर्चों से संबंधित 15 बिंदुओं में जानकारी मांगी थी। इसके लिए उन्होंने 80 रुपये की निर्धारित फीस भी जमा की थी। लेकिन विभाग ने न तो समय पर जवाब दिया और न ही पूरी जानकारी प्रदान की। लगभग साढ़े छह महीने बाद जब जवाब मिला, तो वह चार हजार पन्नों से अधिक और एक क्विंटल से ज्यादा वजनी दस्तावेज के रूप में था। पंकज का आरोप है कि इस जवाब में आधी जानकारी गायब थी, और बाकी हिस्सा गैर-जरूरी रिकॉर्ड से भरा हुआ था। अब उन्होंने राज्य सूचना आयोग में अपील की है, जिसे स्वीकार कर लिया गया है। इसके साथ ही, विभाग द्वारा ली गई फीस भी सरकारी खाते में जमा नहीं करवाई गई, जिसकी पुष्टि बैंक ने की है।
मामले की मुख्य बातें
- पंकज ने 30 जनवरी को आरटीआई दायर की थी, जिसके जवाब में विभाग ने 85,000 रुपये (80,000 सूचना शुल्क + 5,000 डाक खर्च) की मांग की
- आरटीआई अधिनियम के तहत डाक खर्च वसूलना गैरकानूनी है
- 10 मार्च को 80,000 रुपये जमा कराने के बावजूद विभाग ने समय पर जानकारी नहीं दी
- बैंक ने पुष्टि की कि यह राशि सरकारी खाते में जमा नहीं हुई
- दस्तावेजों का वास्तविक वजन 1 क्विंटल 8 किलो (लगभग 25,000 पेज) ही था, 37,543 पेज नहीं
विवाद के प्रमुख बिंदु
- अधूरी जानकारी: दिए गए दस्तावेजों में अधिकांश पृष्ठ अप्रासंगिक थे और मांगी गई जानकारी छिपाई गई थी।
- अनियमितता: विभाग ने सूचना देने के बजाय अप्रासंगिक दस्तावेजों का पहाड़ खड़ा कर दिया।
- भ्रष्टाचार के आरोप: पंकज का दावा है कि टेंडर प्रक्रिया में अनियमितताएं छिपाने के लिए ऐसा किया गया।
- कागजात की गुणवत्ता: फोटोस्टेट किए गए पृष्ठों की गुणवत्ता इतनी खराब थी कि पढ़ना मुश्किल था।
अब तक की कार्रवाई
- पंकज ने हरियाणा राज्य सूचना आयोग में अपील दायर की है
- कुरुक्षेत्र के उपायुक्त ने विभाग को नोटिस जारी किया है
- मामले की जांच चल रही है
आरटीआई कानून का उल्लंघन
यह मामला आरटीआई अधिनियम 2005 के मूल उद्देश्यों के सीधे विपरीत है, जिसमें निम्नलिखित उल्लंघन हुए हैं:
- धारा 7(1): सूचना समय पर नहीं दी गई
- धारा 7(3): अत्यधिक शुल्क की मांग
- धारा 7(9): सूचना को जानबूझकर जटिल बनाया गया
पंकज ने लगातार गवर्नर हाउस, मुख्यमंत्री कार्यालय, मुख्य सचिव और इंजीनियर-इन-चीफ को अपनी शिकायतें भेजीं। इसके बाद, डीसी ने विभाग को सख्त निर्देश दिए कि पैसे लेने के बावजूद सूचना क्यों नहीं दी जा रही। तब विभाग ने दबाव में आकर कुछ जानकारी दी, लेकिन पंकज का कहना है कि यह जानकारी आधी-अधूरी है। विभाग ने दावा किया कि उन्होंने 37,543 पन्नों की जानकारी दी है, लेकिन पंकज ने इन दस्तावेजों का वजन करवाया, जो एक क्विंटल 8 किलो 200 ग्राम निकला। उनके अनुसार, वजन के आधार पर यह 25,000 पन्नों से भी कम है।
सबसे गंभीर आरोप यह है कि विभाग ने 80,000 रुपये की फीस सरकारी खाते में जमा नहीं करवाई। बैंक ने लिखित में पुष्टि की कि 80,000 रुपये का बैंकर चेक और 100 रुपये का ड्राफ्ट, जिनकी वैधता तीन महीने थी, अब समाप्त हो चुकी है। पंकज का कहना है कि विभाग ने न केवल सरकारी धन का दुरुपयोग किया, बल्कि फोटोकॉपी का खर्च भी सरकारी खाते से नहीं, बल्कि अन्य स्रोतों से किया।
पंकज का कहना है कि यदि मांगी गई जानकारी आरटीआई के दायरे में नहीं थी, तो विभाग को पहले दिन ही यह स्पष्ट करना चाहिए था। इसके बजाय, उन्हें महीनों तक लटकाया गया। अब यह मामला राज्य सूचना आयोग के समक्ष है, और जनता को उम्मीद है कि आयोग इस मामले में सख्त दिशा-निर्देश देगा। पारदर्शिता और समय पर सूचना प्रदान करना लोकतंत्र की असली पहचान है, और इस मामले ने जन स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
यह मामला सरकारी विभागों में पारदर्शिता की कमी और आरटीआई कार्यकर्ताओं के साथ हो रही छेड़छाड़ को उजागर करता है। राज्य सूचना आयोग की कार्रवाई से ही स्पष्ट होगा कि क्या सूचना के अधिकार को वास्तव में मजबूती मिल पाएगी।
