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अमेरिका में लगभग 4.5 लाख उल्लुओं को मारने की योजना: पर्यावरण संतुलन बनाम मानव हस्तक्षेप

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Last updated: July 18, 2025 5:37 pm
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Plan to kill about 4.5 lakh owls in America: Environmental balance vs human intervention
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अमेरिकी वन्यजीव अधिकारियों ने लगभग 4.5 लाख बार्ड उल्लुओं (Barred Owls) को मारने की योजना बनाई है ताकि स्पॉटेड उल्लुओं (Spotted Owls) को बचाया जा सके।

क्यों हो रही है यह योजना?

  • स्पॉटेड उल्लू का संकट: स्पॉटेड उल्लू (Strix occidentalis) अमेरिका के पश्चिमी जंगलों में पाया जाता है और यह एक संकटग्रस्त प्रजाति है। इसकी आबादी तेजी से घट रही है।
  • बार्ड उल्लू का प्रभाव: बार्ड उल्लू (Strix varia) एक आक्रामक प्रजाति है, जो मूल रूप से पूर्वी अमेरिका में पाया जाता था, लेकिन अब यह पश्चिमी जंगलों में फैल गया है। ये बड़े और अधिक आक्रामक हैं, जिसके कारण:
    • वे स्पॉटेड उल्लुओं के आवास पर कब्जा कर रहे हैं।
    • वे स्पॉटेड उल्लुओं के भोजन (जैसे चूहे, छोटे पक्षी) के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं।
    • कुछ मामलों में, बार्ड उल्लू स्पॉटेड उल्लुओं को सीधे मार देते हैं या उनके घोंसलों को नष्ट कर देते हैं।
  • उद्देश्य: स्पॉटेड उल्लू को विलुप्त होने से बचाने के लिए, अमेरिकी वन्यजीव सेवा (U.S. Fish and Wildlife Service) ने बार्ड उल्लुओं की आबादी को नियंत्रित करने का फैसला किया है।

कैसे होगी यह कार्रवाई?

  • प्रशिक्षित निशानेबाजों को नियुक्त किया जाएगा, जो बार्ड उल्लुओं को गोली मारेंगे।
  • यह योजना अगले 30 वर्षों में लागू होगी, जिसमें प्रति वर्ष लगभग 15,000 उल्लुओं को हटाने का लक्ष्य है।
  • यह कार्रवाई मुख्य रूप से कैलिफोर्निया, ओरेगन, और वाशिंगटन के जंगलों में होगी।

विरोध और नैतिक सवाल:

  • संरक्षणवादियों का विरोध: कई पर्यावरणविद और पशु अधिकार कार्यकर्ता इस योजना का विरोध कर रहे हैं। उनका तर्क है कि एक प्रजाति को बचाने के लिए दूसरी प्रजाति को मारना नैतिक रूप से गलत है और इससे पारिस्थितिकी तंत्र में असंतुलन पैदा हो सकता है।
  • समर्थकों का तर्क: समर्थक कहते हैं कि स्पॉटेड उल्लू की रक्षा जैव विविधता के लिए जरूरी है, क्योंकि यह एक मूल प्रजाति है, जबकि बार्ड उल्लू एक आक्रामक प्रजाति है, जो पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचा रही है।
  • पारिस्थितिकी संतुलन: बार्ड उल्लुओं को हटाने से छोटे शिकार प्रजातियों (जैसे चूहे) की आबादी बढ़ सकती है, जिसका प्रभाव अन्य प्रजातियों पर पड़ सकता है।

2. केन्या में भारतीय कौवों को मारने की योजना

खबर: केन्या ने अगले 6 महीनों में 10 लाख भारतीय कौवों (Corvus splendens) को मारने की योजना बनाई है।

क्यों हो रही है यह योजना?

  • भारतीय कौवे का प्रभाव:
    • भारतीय कौवा (House Crow) एक आक्रामक प्रजाति है, जो मूल रूप से दक्षिण एशिया (भारत, नेपाल, बांग्लादेश) में पाया जाता है। माना जाता है कि यह 19वीं सदी में ब्रिटिश जहाजों के जरिए केन्या पहुंचा।
    • ये कौवे केन्या के तटीय क्षेत्रों में स्थानीय छोटे पक्षियों (indigenous birds) के अंडे और चूजों को खा रहे हैं, जिससे स्थानीय पक्षी प्रजातियों को खतरा है।
    • ये फसलों, पोल्ट्री फार्म्स, और अनाज के बीजों को नुकसान पहुंचाते हैं।
    • पर्यटकों के लिए असुविधा: ये कौवे तटीय क्षेत्रों में पर्यटकों को परेशान करते हैं और हवाई जहाजों के लिए खतरा बन रहे हैं, क्योंकि वे उड़ान के दौरान टकरा सकते हैं।
  • पर्यटन पर प्रभाव: केन्या की अर्थव्यवस्था में पर्यटन तीसरा सबसे बड़ा क्षेत्र है, और मसाई मारा जैसे नेशनल पार्क्स दुनिया भर से पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। कौवों के कारण स्थानीय पक्षियों की कमी पर्यटन को प्रभावित कर सकती है।

कैसे होगी यह कार्रवाई?

  • केन्या वन्यजीव सेवा ने Starlicide नामक जहर का उपयोग करने की योजना बनाई है। यह जहर मांस में मिलाकर कौवों को खिलाया जाएगा।
  • जहर की खासियत: यह केवल कौवों को प्रभावित करता है और अन्य प्रजातियों के लिए सुरक्षित माना जाता है।
  • यह अभियान 31 दिसंबर 2025 तक पूरा करने का लक्ष्य है।

पर्यावरणीय चिंताएँ:

  • पारिस्थितिकी असंतुलन: कौवे स्कैवेंजर्स हैं, जो कचरे और सड़े-गले पदार्थों को खाकर पर्यावरण को साफ रखते हैं। इनकी इतनी बड़ी संख्या में हत्या से कचरे का प्रबंधन प्रभावित हो सकता है।
  • स्थानीय पक्षियों पर प्रभाव: हालांकि यह योजना स्थानीय पक्षियों को बचाने के लिए है, लेकिन जहर का अनियंत्रित उपयोग अन्य प्रजातियों को भी नुकसान पहुंचा सकता है।

कौवों का “भारतीय” नाम: यह नाम इसलिए पड़ा क्योंकि ये कौवे दक्षिण एशिया से उत्पन्न हुए। हालांकि, कोई ठोस ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं है कि ये ब्रिटिश जहाजों के जरिए ही केन्या पहुंचे, लेकिन यह एक स्वीकृत धारणा है।


3. पर्यावरणीय और नैतिक सवाल

  • पारिस्थितिकी संतुलन: दोनों योजनाएँ (उल्लू और कौवे) एक प्रजाति को बचाने के लिए दूसरी प्रजाति को खत्म करने पर केंद्रित हैं। यह पारिस्थितिकी तंत्र में असंतुलन पैदा कर सकता है। उदाहरण के लिए:
    • कौवों की कमी से कचरा प्रबंधन प्रभावित हो सकता है, जिससे कीटों की आबादी बढ़ सकती है।
    • बार्ड उल्लुओं की कमी से छोटे शिकार प्रजातियों की आबादी बढ़ सकती है, जो अन्य प्रजातियों को प्रभावित कर सकता है।
  • नैतिकता: क्या एक प्रजाति को बचाने के लिए दूसरी को मारना उचित है? यह सवाल संरक्षणवादियों और नीति निर्माताओं के बीच बहस का विषय है।
  • मानव हस्तक्षेप: ये योजनाएँ मानव हस्तक्षेप का परिणाम हैं। बार्ड उल्लू और भारतीय कौवे दोनों ही मानव गतिविधियों (जैसे जहाजों या शहरीकरण) के कारण नए क्षेत्रों में पहुंचे। अब इन्हें नियंत्रित करने के लिए फिर से मानव हस्तक्षेप की जरूरत पड़ रही है।

4. भारत में बंदरों का उदाहरण

आपने भारत में बंदरों को मारने के लिए पैसे देने की बात का जिक्र किया। यह सही है कि भारत में कुछ क्षेत्रों में रीसस मकाक (Rhesus Macaque) जैसे बंदरों की आबादी को नियंत्रित करने के लिए अभियान चलाए गए हैं। उदाहरण:

  • हिमाचल प्रदेश: यहाँ बंदरों को फसलों और संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के लिए “कीट” घोषित किया गया था, और उनकी संख्या कम करने के लिए स्थानीय लोगों को प्रोत्साहन दिया गया।
  • लंगूर बनाम मकाक: लाल मुंह के मकाक बंदरों ने कई क्षेत्रों में लंगूरों को विस्थापित कर दिया है, जैसा कि आपने बताया। इसे नियंत्रित करने के लिए लंगूरों को लाने की कोशिश की गई, लेकिन यह हमेशा सफल नहीं रहा।

5. निष्कर्ष और सुझाव

  • जागरूकता: ये मामले दिखाते हैं कि आक्रामक प्रजातियाँ (Invasive Species) पारिस्थितिकी तंत्र को कैसे प्रभावित कर सकती हैं। जनता को इन मुद्दों के बारे में जागरूक होने की जरूरत है।
  • वैकल्पिक उपाय:
    • मारने के बजाय, आक्रामक प्रजातियों को उनके मूल क्षेत्रों में वापस भेजने या उनकी प्रजनन दर को नियंत्रित करने (जैसे नसबंदी) पर विचार किया जा सकता है।
    • पर्यावरणीय प्रभाव अध्ययन (Environmental Impact Assessment) को और सख्त करना चाहिए ताकि जहर या अन्य तरीकों का उपयोग न्यूनतम नुकसान के साथ हो।
  • संरक्षण नीतियाँ: सरकारों को संरक्षण नीतियों को संतुलित करना चाहिए, जिसमें सभी प्रजातियों के लिए दीर्घकालिक प्रभावों को ध्यान में रखा जाए।
  • आपकी भागीदारी: जैसा कि आपने कहा, इस तरह के मुद्दों को सोशल मीडिया और चैनलों के जरिए साझा करना जागरूकता बढ़ाने में मदद करता है। अपने दर्शकों को प्रोत्साहित करें कि वे पर्यावरण संरक्षण के लिए स्थानीय पहलों में शामिल हों।

अतिरिक्त जानकारी

  • IUCN स्थिति: भारतीय कौवा (Corvus splendens) को IUCN की रेड लिस्ट में “Least Concern” श्रेणी में रखा गया है, यानी इनकी आबादी को कोई बड़ा खतरा नहीं है। लेकिन स्थानीय स्तर पर ये पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
  • अमेरिका का विरोध: अमेरिका में बार्ड उल्लुओं को मारने की योजना को लेकर कई मुकदमे दायर किए गए हैं। संरक्षणवादी समूह, जैसे Animal Welfare Institute, इसे अदालत में चुनौती दे रहे हैं।
  • केन्या की अर्थव्यवस्था: केन्या की GDP में पर्यटन का योगदान लगभग 10% है, और यह 3.7% वार्षिक वृद्धि के साथ अफ्रीका की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है।
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