अपडेटेड: गुरुवार, 11 सितंबर 2025, शाम 7:20 बजे (IST)
कर्नाटक हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 की धारा 9 की समीक्षा करने की अपील की है। कोर्ट का कहना है कि बुजुर्ग माता-पिता के लिए 10,000 रुपये प्रति माह की भरण-पोषण सीमा आज की आर्थिक स्थिति को नहीं दर्शाती। इसे महंगाई के हिसाब से अपडेट करने की जरूरत है।
कर्नाटक हाईकोर्ट ने की केंद्र से सिफारिश
नई दिल्ली, डिजिटल डेस्क। कर्नाटक हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 की धारा 9 की समीक्षा और संशोधन की सिफारिश की है। यह धारा न्यायाधिकरणों को बुजुर्ग माता-पिता के लिए 10,000 रुपये प्रति माह से अधिक भरण-पोषण राशि देने से रोकती है।
जस्टिस एम. नागप्रसन्ना ने एक याचिका की सुनवाई के दौरान कहा कि यह सीमा अब आज की आर्थिक हकीकत को नहीं दर्शाती। उन्होंने सुझाव दिया कि इसे जीवन-यापन की लागत और महंगाई के हिसाब से बढ़ाया जाना चाहिए।
कोर्ट ने क्या कहा
जज ने कहा, “यह कोर्ट गंभीरता से सिफारिश करता है कि केंद्र सरकार धारा 9 की समीक्षा करे और जीवन-यापन सूचकांक के अनुसार अधिकतम सीमा में बदलाव करे। यह अधिनियम केवल एक खोखला वादा न बने, बल्कि बुढ़ापे में सम्मान और सुविधा की जीवंत गारंटी बने।”
कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि किसी देश की असली ताकत उसकी भौतिक प्रगति के साथ-साथ इस बात से भी मापी जाती है कि वह अपने बच्चों और बुजुर्गों के साथ कैसा व्यवहार करता है।
2007 से अब तक जीवन-यापन की लागत में भारी बढ़ोतरी का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि 10,000 रुपये की सीमा अब “समय के साथ अप्रासंगिक” हो गई है। कोर्ट ने सरकार के मुद्रास्फीति सूचकांक का जिक्र करते हुए कहा कि 2007 में 100 रुपये में जो चीज मिलती थी, उसके लिए 2025 में करीब 1,000 रुपये चाहिए।
पीठ ने कहा, “भोजन, आवास और स्वास्थ्य सेवाओं के खर्च कई गुना बढ़ गए हैं। फिर भी, भरण-पोषण की सीमा वही पुरानी है, जिससे बुजुर्गों की बुनियादी जरूरतें पूरी करना भी मुश्किल हो गया है।”
कोर्ट ने सवाल उठाया कि क्या इतनी कम राशि सम्मान और चिकित्सा देखभाल दे सकती है? साथ ही चेतावनी दी कि इस हकीकत को नजरअंदाज करने से बुढ़ापा “मात्र एक पशुवत अस्तित्व” बनकर रह जाएगा। कोर्ट ने कहा कि जो राहत झूठी हो, वह राहत नहीं है।
2019 में हुआ था अधिनियम में संशोधन
गौरतलब है कि 2019 में इस अधिनियम में संशोधन किया गया था, लेकिन धारा 9(2) के तहत 10,000 रुपये की सीमा को नहीं बदला गया। 2019 के एक संशोधन विधेयक में इस सीमा को हटाने और न्यायाधिकरणों को वरिष्ठ नागरिकों की जरूरतों के हिसाब से भरण-पोषण राशि तय करने की छूट देने का प्रस्ताव था। हालांकि, यह प्रस्ताव कभी लागू नहीं हुआ।
चूंकि यह सीमा केंद्रीय कानून में तय है, इसलिए कोर्ट ने साफ किया कि राज्य सरकारें 10,000 रुपये से ज्यादा राशि देने के नियम नहीं बना सकतीं।
