नई दिल्ली: संसद का मानसून सत्र 2025 जोरदार हंगामे और विवादों की भेंट चढ़ गया। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच लगातार टकराव के चलते लोकसभा महज 37 घंटे ही काम कर पाई, जबकि राज्यसभा की कार्यक्षमता भी सिर्फ 39% रही। ऑपरेशन सिंदूर पर हुई गर्मा-गर्म बहस को छोड़ दें तो ज्यादातर अहम मुद्दे नारेबाजी और तख्तियों की भेंट चढ़ गए। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सदन की गिरती गरिमा पर चिंता जताते हुए सभी सांसदों से ‘आत्ममंथन’ करने की अपील की। आइए जानते हैं इस उठा-पटक भरे सत्र की पूरी कहानी।
क्यों डूबा पूरा सत्र?
21 अगस्त को समाप्त हुए इस सत्र में विपक्ष लगातार बिहार की मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण को लेकर हंगामा करता रहा। उनका आरोप था कि इस प्रक्रिया में मतदाताओं के अधिकारों के साथ छेड़छाड़ हुई है। इसी एक मुद्दे ने पूरे सत्र को ऐसा जकड़ा कि देश के दूसरे जरूरी मसलों पर चर्चा तक नहीं हो पाई। 120 घंटे के निर्धारित समय में लोकसभा का कामकाज सिर्फ 37 घंटे ही चल सका।
स्पीकर ओम बिरला बोले- ‘देश की नजरें हम पर हैं’
सत्र के अंतिम दिन लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला का टोन गंभीर था। उन्होंने कहा, “सदन की गरिमा के अनुरूप आचरण और भाषा इस बार नजर नहीं आई। पूरा देश हमें देख रहा है, जनता को उम्मीद होती है कि उनके मुद्दों पर गंभीर चर्चा होगी।” उन्होंने सांसदों से आगे आने वाले सत्रों में ऐसी स्थिति न बनाने की गुजारिश की।
राज्यसभा की हालत भी खराब
राज्यसभा में भी हालात कुछ बेहतर नहीं थे। उपसभापति हरिवंश ने सत्र की उत्पादकता मात्र 38.88% रहने पर निराशा जताई और इसे ‘आत्ममंथन का विषय’ बताया। पूरे सत्र में सदन सिर्फ 41 घंटे 15 मिनट चला। प्रश्नकाल और शून्यकाल बुरी तरह प्रभावित हुए, जिससे जनता के कई जरूरी मुद्दे अनसुने रह गए।
फिर भी पास हुए 12 अहम विधेयक
हंगामे के बीच भी सरकार 12 अहम विधेयक पास कराने में कामयाब रही। लोकसभा में कुल 14 विधेयक पेश किए गए, जिनमें से आयकर संशोधन विधेयक, कराधान कानून संशोधन विधेयक, राष्ट्रीय खेल प्रशासन विधेयक और ऑनलाइन गेमिंग विनियमन विधेयक जैसे प्रमुख बिल शामिल हैं। 130वां संविधान संशोधन विधेयक संयुक्त संसदीय समिति (JPC) को भेजा गया।
हालांकि, प्रश्नकाल सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ। लोकसभा में सूचीबद्ध 419 तारांकित प्रश्नों में से सिर्फ 55 के जवाब ही मिल पाए। ऑपरेशन सिंदूर और भारत की अंतरिक्ष उपलब्धियों पर हुई चर्चा को छोड़कर बाकी महत्वपूर्ण मुद्दे दबे रह गए।
क्या रह गया सबक?
सत्र का समापन त्योहारों की शुभकामनाओं और धन्यवाद प्रस्तावों के साथ तो हुआ, लेकिन पीछे रह गए संसदीय गरिमा के सवाल। यह सत्र एक बड़ा सवाल छोड़ गया है कि जब जनता के मुद्दे हंगामे में दब जाते हैं, तो लोकतंत्र का असली मकसद क्या रह जाता है? यह चुनौती अब अगले शीतकालीन सत्र के सामने होगी।