केरल की नर्स निमिषा प्रिया को यमन में 16 जुलाई 2025 को फांसी दी जानी है। उन पर 2017 में अपने यमनी पार्टनर तलाल अब्दुल मेहंदी की हत्या का आरोप है। इस मामले की सुनवाई भारत के सुप्रीम कोर्ट में 14 जुलाई 2025 को निर्धारित है, जहां केंद्र सरकार से पूछा गया है कि निमिषा को बचाने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में सरकार से राजनयिक प्रयासों के जरिए निमिषा की सजा को रद्द करने या कम करने की मांग की गई है। इस बीच, इस्लामिक कानून में ब्लड मनी (दियात) का विकल्प सामने आया है, जो उनकी जान बचाने की आखिरी उम्मीद माना जा रहा है।
निमिषा प्रिया की पृष्ठभूमि और यमन में घटना
निमिषा प्रिया 2008 में नर्स के रूप में यमन गई थीं। खाड़ी देशों में केरल से बड़ी संख्या में नर्सें काम करने जाती हैं, और यमन भी इसका अपवाद नहीं था। 2011 में उनकी शादी एक भारतीय व्यक्ति से हुई, लेकिन उसी साल अरब स्प्रिंग और यमन में गृहयुद्ध जैसे हालात के कारण उनके पति और बच्चे भारत लौट आए। 2014 में हुती विद्रोहियों ने यमन की राजधानी सना पर कब्जा कर लिया, जिसके चलते निमिषा का परिवार यमन वापस नहीं जा सका। निमिषा ने सना में एक क्लीनिक खोलने का सपना देखा और इसके लिए यमनी नागरिक तलाल अब्दुल मेहंदी के साथ साझेदारी की।
यह साझेदारी उनके लिए मुसीबत बन गई। तलाल ने क्लीनिक का सारा राजस्व हड़प लिया, निमिषा का पासपोर्ट जब्त कर लिया और उन पर शारीरिक व मानसिक अत्याचार किए। उसने फर्जी दस्तावेज बनाए और खुद को निमिषा का पति बताने की कोशिश की। पासपोर्ट वापस लेने के लिए एक वार्डन की सलाह पर निमिषा ने तलाल को बेहोश करने की कोशिश की, लेकिन दवा की अधिक मात्रा के कारण तलाल की मौत हो गई। 2020 में यमनी अदालत ने निमिषा को मौत की सजा सुनाई, और 2023 में उनकी अंतिम अपील खारिज हो गई। अब 16 जुलाई 2025 को उनकी फांसी तय है।
भारत सरकार और सुप्रीम कोर्ट के प्रयास
भारत सरकार निमिषा को बचाने के लिए राजनयिक प्रयास कर रही है, लेकिन सना में हुती विद्रोहियों का नियंत्रण होने के कारण बातचीत में मुश्किलें आ रही हैं। भारत का हुती विद्रोहियों के साथ कोई औपचारिक राजनयिक संपर्क नहीं है, जिससे यह प्रक्रिया जटिल हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लिया है और 14 जुलाई 2025 को सुनवाई का समय निर्धारित किया है। कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि निमिषा को बचाने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं। याचिका में सरकार से राजनयिक और कानूनी रास्ते तलाशने का अनुरोध किया गया है।
इस्लामिक कानून में ब्लड मनी (दियात) का सिद्धांत
इस्लामिक कानून (शरीयत) में हत्या दो प्रकार की मानी जाती है: जानबूझकर (इरादतन) और आकस्मिक (गैर-इरादतन)। जानबूझकर हत्या के लिए किसास (समान प्रतिशोध) का प्रावधान है, जिसका अर्थ है “जान के बदले जान” या “आंख के बदले आंख”। हालांकि, अगर पीड़ित का परिवार प्रतिशोध की मांग नहीं करता, तो वे दियात (ब्लड मनी) के रूप में मुआवजा स्वीकार कर सकते हैं।
दियात एक वित्तीय मुआवजा है, जो हत्या या शारीरिक क्षति के मामलों में पीड़ित के परिवार को दिया जाता है। यह किसास के विकल्प के रूप में काम करता है। दियात की राशि अपराध की गंभीरता और पीड़ित की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर निर्भर करती है, और इसे पीड़ित के परिवार द्वारा तय किया जाता है। गैर-इरादतन हत्या में दियात का प्रावधान आम है, लेकिन जानबूझकर हत्या में भी परिवार की सहमति से इसे स्वीकार किया जा सकता है।
निमिषा के मामले में, उनके परिवार ने तलाल के परिवार को 10 लाख अमेरिकी डॉलर (लगभग 8.6 करोड़ रुपये) की ब्लड मनी ऑफर की है। अगर तलाल का परिवार इस राशि को स्वीकार करता है, तो निमिषा की फांसी टाली जा सकती है। यह उनकी जान बचाने की अंतिम उम्मीद है।
किसास और दियात की अवधारणा
शरीयत में किसास और दियात दो प्रमुख सिद्धांत हैं, जो अपराध और सजा से संबंधित हैं। किसास का अर्थ है समान प्रतिशोध, जो अरबी शब्द कस्स से निकला है, जिसका मतलब है “पदचिह्नों का अनुसरण करना”। इसका तात्पर्य है कि अपराधी को वही सजा दी जाए, जो उसने पीड़ित के साथ की। उदाहरण के लिए, हत्या के मामले में अपराधी को मौत की सजा दी जा सकती है।
किसास अनिवार्य नहीं है। पीड़ित के परिवार की सहमति से इसे माफ किया जा सकता है, और इसके बदले दियात स्वीकार किया जा सकता है। दियात का उपयोग प्राचीन अरब समाज में जनजातीय हिंसा और खून की दुश्मनी को रोकने के लिए शुरू हुआ था। आधुनिक इस्लामिक राज्यों में, किसास और दियात के तहत सजा का निर्णय आमतौर पर राज्य करता है, लेकिन पीड़ित के परिवार की राय महत्वपूर्ण होती है।
यमन में हुती विद्रोहियों की चुनौती
निमिषा के मामले में सबसे बड़ी चुनौती सना में हुती विद्रोहियों का नियंत्रण है। भारत का हुती विद्रोहियों के साथ कोई औपचारिक राजनयिक संपर्क नहीं है, जिसके कारण बातचीत में बाधाएं आ रही हैं। यमन में गृहयुद्ध और अरब स्प्रिंग के बाद से अस्थिरता बनी हुई है, जिसने इस मामले को और जटिल बना दिया है। ब्लड मनी की पेशकश के बावजूद, तलाल के परिवार की सहमति और यमनी प्रशासन का रुख इस मामले में निर्णायक होगा।
निमिषा प्रिया का मामला मानवीय और कानूनी रूप से जटिल है। इस्लामिक कानून में ब्लड मनी (दियात) उनकी जान बचाने का एक संभावित रास्ता है, लेकिन इसके लिए तलाल के परिवार की सहमति और राजनयिक प्रयासों की सफलता जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट की 14 जुलाई की सुनवाई और भारत सरकार के प्रयास इस मामले में निर्णायक हो सकते हैं। 16 जुलाई 2025 तक का समय महत्वपूर्ण है, और यह देखना बाकी है कि क्या निमिषा को फांसी से बचाया जा सकेगा।
डेली क्विज: इस्लामिक कानून में दियात के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?
- यह एक प्रकार का धार्मिक कर है, जो सभी मुस्लिमों को देना होता है।
- यह हत्या या शारीरिक क्षति के मामलों में पीड़ित के परिवार को दिया जाने वाला मुआवजा है।
- यह केवल युद्ध के दौरान क्षतिपूर्ति के लिए लागू होता है।
- यह इस्लामिक कानून में सजा को बढ़ाने के लिए उपयोग किया जाता है।
(उत्तर कमेंट सेक्शन में दें।)
