दुनिया भर में इस समय सबसे चर्चित चेहरों में से एक हैं ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामनेई। इजरायल और अमेरिका के साथ बढ़ते तनाव के बीच उनकी हर गतिविधि और बयान पर वैश्विक नजरें टिकी हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि खामनेई परिवार का रिश्ता भारत, खासकर उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले से जुड़ा है? यह कहानी न केवल आश्चर्यजनक है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि कैसे एक परिवार ने 200 साल पहले भारत से ईरान जाकर वहां की सत्ता पर कब्जा कर लिया। आइए, इस दिलचस्प इतिहास को विस्तार से समझें।
खामनेई परिवार का भारतीय मूल
आयतुल्लाह अली खामनेई का परिवार, जिसे ‘खामनेई खानदान’ के नाम से जाना जाता है, एक ईरानी अजरबैजानी सैयद परिवार है, जो शिया इस्लाम के चौथे इमाम, अली इब्न हुसैन ज़ैन अल-आबिदीन (इमाम सज्जाद) के वंशज होने का दावा करता है। इस परिवार की जड़ें भारत के उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के किंतूर गांव से जुड़ती हैं, जहाँ उनके पूर्वज सैयद अहमद मूसवी का जन्म हुआ था।
- सैयद अहमद मूसवी ‘हिंदी’: 1790 के आसपास बाराबंकी के किंतूर गांव में जन्मे सैयद अहमद मूसवी एक शिया धर्मगुरु थे। 1830 में, 40 वर्ष की आयु में, वह अवध के नवाब के साथ धार्मिक यात्रा (ज़ियारत) के लिए ईरान गए। उन्होंने ईरान के खोमैन शहर में स्थायी रूप से बसने का फैसला किया। अपनी भारतीय पहचान को बनाए रखने के लिए उन्होंने अपने नाम के साथ ‘हिंदी’ जोड़ा, और वह सैयद अहमद मूसवी ‘हिंदी’ के नाम से जाने गए।
- रुहोल्लाह खोमैनी का उदय: सैयद अहमद मूसवी के पोते, रुहोल्लाह खोमैनी, का जन्म 1902 में खोमैन में हुआ। उनके पिता, मुस्तफा हिंदी खोमैनी, की हत्या तब हुई जब रुहोल्लाह मात्र दो वर्ष के थे। उनकी माँ और भाई ने उन्हें पाला। रुहोल्लाह बाद में आयतुल्लाह खोमैनी के नाम से विश्वविख्यात हुए।
- 1979 की इस्लामी क्रांति: खोमैनी ने 1979 में ईरान की इस्लामी क्रांति का नेतृत्व किया, जिसने पहलवी राजवंश को उखाड़ फेंका। 16 जनवरी 1979 को शाह मोहम्मद रजा पहलवी को देश छोड़कर भागना पड़ा, और खोमैनी ईरान के पहले सुप्रीम लीडर बने। उन्होंने ईरान को एक उदार राजशाही से कट्टरपंथी शिया इस्लामी गणतंत्र में बदल दिया।
आयतुल्लाह अली खामनेई और उत्तराधिकार
1989 में खोमैनी की मृत्यु के बाद अली खामनेई को सुप्रीम लीडर चुना गया। वह 1939 में मशहद में एक साधारण धार्मिक परिवार में पैदा हुए थे। उनके पिता, सैयद जवाद खामनेई, एक सादगी भरा जीवन जीने वाले विद्वान थे। खामनेई ने क़ोम में रुहोल्लाह खोमैनी सहित प्रमुख शिया विद्वानों के अधीन धार्मिक शिक्षा प्राप्त की और 1979 की क्रांति में सक्रिय भूमिका निभाई।
- भारतीय मूल का प्रभाव: हालांकि खामनेई का जन्म और पालन-पोषण ईरान में हुआ, उनके परिवार की भारतीय जड़ें, विशेष रूप से सैयद अहमद मूसवी ‘हिंदी’ की शिक्षाएँ, खोमैनी के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से उनकी विचारधारा को प्रभावित करती रहीं। खोमैनी की कविताओं और ग़ज़लों में ‘हिंद’ शब्द का बार-बार उल्लेख उनकी भारतीय जड़ों के प्रति सम्मान को दर्शाता है।
- वर्तमान में खामनेई: 86 वर्षीय खामनेई पिछले 35 वर्षों से ईरान के सुप्रीम लीडर हैं, जो मध्य पूर्व में सबसे लंबे समय तक शासन करने वाले नेता हैं। वह ईरान की विदेश नीति, सेना और आंतरिक सुरक्षा पर अंतिम निर्णय लेते हैं। हाल के इजरायल-ईरान तनाव और उनके स्वास्थ्य को लेकर अटकलों ने उन्हें वैश्विक सुर्खियों में ला दिया है।
क्यों है खामनेई इतने चर्चित?
- इजरायल-ईरान संघर्ष: इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने खामनेई को निशाना बनाने की बात कही है। इजरायल ने हाल के हवाई हमलों में ईरान के सैन्य ठिकानों और कमांडरों को निशाना बनाया, जिससे खामनेई की सुरक्षा और उत्तराधिकार को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
- स्वास्थ्य और उत्तराधिकार: खबरों के अनुसार, खामनेई की तबीयत खराब है, और वह कथित तौर पर कोमा में हैं। उनके उत्तराधिकार को लेकर चर्चा तेज है, जिसमें उनके बेटे मोजतबा खामनेई का नाम सामने आया है। हालांकि, खोमैनी और खामनेई दोनों ने वंशानुगत शासन को ‘गैर-इस्लामी’ बताया था, जिससे मोजतबा का सुप्रीम लीडर बनना मुश्किल लगता है।
- वैश्विक प्रभाव: खामनेई ने ईरान को अमेरिका, इजरायल और सऊदी अरब के खिलाफ एक क्षेत्रीय शक्ति बनाया है। हिजबुल्लाह और हमास जैसे समूहों को समर्थन देकर उन्होंने मध्य पूर्व में ईरान का प्रभाव बढ़ाया है।
बाराबंकी से ईरान तक का सफर: एक चमत्कारी कहानी
यह कहानी वाकई आश्चर्यजनक है कि कैसे 230 साल पहले बाराबंकी के किंतूर गांव से निकला एक परिवार आज ईरान की सत्ता का केंद्र बन गया। सैयद अहमद मूसवी ‘हिंदी’ की धार्मिक यात्रा ने न केवल उनके परिवार, बल्कि पूरे ईरान के इतिहास को बदल दिया। उनके पोते रुहोल्लाह खोमैनी ने 1979 की क्रांति के जरिए ईरान को एक इस्लामी गणतंत्र बनाया, और आज अली खामनेई उसी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।
- किंतूर का योगदान: बाराबंकी का किंतूर गांव, जो 1858 की क्रांति के लिए भी जाना जाता है, आज भी इस ऐतिहासिक संबंध के लिए चर्चा में है। यह गांव उस शिया धार्मिक परंपरा का केंद्र रहा, जिसने खोमैनी और खामनेई के विचारों को आकार दिया।
- वैश्विक प्रभाव: खामनेई का परिवार न केवल ईरान, बल्कि वैश्विक भू-राजनीति में भी महत्वपूर्ण है। उनकी भारतीय जड़ें इस बात का प्रतीक हैं कि कैसे सांस्कृतिक और धार्मिक प्रवास वैश्विक इतिहास को आकार दे सकते हैं।
आयतुल्लाह अली खामनेई और उनके परिवार की कहानी बाराबंकी से शुरू होकर ईरान की सत्ता के शिखर तक पहुंची है। यह एक ऐसी कहानी है जो इतिहास, धर्म और भू-राजनीति के ताने-बाने को जोड़ती है। खामनेई आज दुनिया के सबसे चर्चित और विवादास्पद नेताओं में से एक हैं, जिनकी हर हलचल पर नजर रखी जा रही है। उनकी भारतीय जड़ें न केवल एक ऐतिहासिक तथ्य हैं, बल्कि यह भी दर्शाती हैं कि कैसे एक छोटा सा गांव वैश्विक इतिहास का हिस्सा बन सकता है।
