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बलूचिस्तान में प्रॉक्सी वॉर: आसिम मुनीर ने आरोप लगाया कि भारत बलूचिस्तान को कंट्रोल कर रहा है

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Last updated: July 31, 2025 5:49 pm
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Proxy war in Balochistan: Asim Munir alleges that India is controlling Balochistan
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पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर ने हाल ही में भारत पर बलूचिस्तान में प्रॉक्सी वॉर छेड़ने का आरोप लगाया है। उनका दावा है कि भारत आतंकी समूहों को समर्थन देकर बलूचिस्तान में अस्थिरता पैदा कर रहा है। हालांकि, ये आरोप बिना सबूत के हैं और पाकिस्तान का प्रचार तंत्र (ISPR) इसे बढ़ावा दे रहा है। इस लेख में हम बलूचिस्तान के हालात, पाकिस्तान के आरोपों, और भारत की संभावित रणनीति पर चर्चा करेंगे।

बलूचिस्तान का संदर्भ और पाकिस्तान की नीतियां

बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा, लेकिन सबसे कम विकसित प्रांत है। इसकी प्राकृतिक संसाधन संपदा (तेल, गैस, खनिज) पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था और सेना के लिए महत्वपूर्ण है। ग्वादर बंदरगाह, जो चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) का हिस्सा है, भी बलूचिस्तान में स्थित है। इसके बावजूद, बलूचिस्तान की जनता को विकास का लाभ नहीं मिला। बुनियादी सुविधाओं की कमी, बेरोजगारी, और मानवाधिकार उल्लंघन (जैसे किल-एंड-डंप नीति) ने स्थानीय लोगों में पाकिस्तानी सेना और सरकार के खिलाफ गुस्सा बढ़ाया है।

पाकिस्तान की सेना बलूचिस्तान में विद्रोही समूहों, जैसे बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) और बलूच राजोई संगार (BRAS), को दबाने के लिए कठोर नीतियां अपनाती है। हाल के वर्षों में इन समूहों की ताकत बढ़ी है, और वे पाकिस्तानी सेना पर हमले कर रहे हैं। आसिम मुनीर और ISPR के डायरेक्टर जनरल अहमद शरीफ चौधरी इन हमलों के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराते हैं, लेकिन कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर पाए।

प्रॉक्सी वॉर का अर्थ और भारत पर आरोप

प्रॉक्सी वॉर में कोई देश सीधे युद्ध में शामिल न होकर दूसरे समूहों या देशों के माध्यम से अपने हित साधता है। मुनीर का दावा है कि भारत की खुफिया एजेंसी रॉ (RAW) बलूच विद्रोहियों को हथियार, प्रशिक्षण, और वित्तीय सहायता दे रही है। हालांकि, पाकिस्तान का इतिहास रहा है कि वह हर आतंकी घटना या अस्थिरता के लिए भारत को दोषी ठहराता है, बिना सबूत के।

भारत ने कभी आधिकारिक तौर पर बलूचिस्तान में हस्तक्षेप की बात स्वीकारी नहीं है। फिर भी, भूराजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भारत के लिए बलूचिस्तान में सक्रियता रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकती है, क्योंकि:

  1. पाकिस्तान की कमजोरी: बलूचिस्तान और POK (पाक अधिकृत कश्मीर) पाकिस्तान की ऊर्जा और आर्थिक स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण हैं। अगर ये क्षेत्र पाकिस्तान के नियंत्रण से बाहर होते हैं, तो उसकी अर्थव्यवस्था और सेना कमजोर हो सकती है।
  2. चीन का प्रभाव: ग्वादर और CPEC के माध्यम से चीन का बलूचिस्तान में बढ़ता प्रभाव भारत के लिए चिंता का विषय है। बलूच विद्रोहियों का समर्थन चीन की योजनाओं को बाधित कर सकता है।
  3. प्रतिशोध: पाकिस्तान ने दशकों तक कश्मीर और भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में आतंकवाद को प्रायोजित किया है। बलूचिस्तान में प्रॉक्सी वॉर भारत के लिए “ब्लीड पाकिस्तान विद 1000 कट्स” की जवाबी रणनीति हो सकती है।

बलूच विद्रोह की वर्तमान स्थिति

हाल के वर्षों में बलूच विद्रोहियों की ताकत बढ़ी है। कुछ प्रमुख बिंदु:

  1. आर्मी का आकार: पहले BLA और BRAS जैसे समूहों में 600-1,000 लड़ाके थे, लेकिन अब इनकी संख्या 5,000-10,000 के बीच मानी जा रही है। तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) और अन्य समूहों के समर्थन ने उनकी ताकत बढ़ाई है।
  2. हथियारों की उपलब्धता: अफगानिस्तान से अमेरिका की वापसी के बाद तालिबान और TTP के पास अमेरिकी हथियार आए, जो बलूच विद्रोहियों तक पहुंच रहे हैं।
  3. स्थानीय समर्थन: बलूचिस्तान की जनता में पाकिस्तानी सेना के खिलाफ आक्रोश बढ़ रहा है। मेहरान बलोच जैसे कार्यकर्ता बलूच आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठा रहे हैं।
  4. भौगोलिक लाभ: बलूचिस्तान का रेगिस्तानी और पहाड़ी भूभाग विद्रोहियों के लिए छिपने और गुरिल्ला युद्ध के लिए अनुकूल है।

पाकिस्तानी सेना को हर हफ्ते हमलों का सामना करना पड़ रहा है। उनके मंत्री स्वीकार करते हैं कि रात में सड़कों पर निकलना असुरक्षित है, और जाफर एक्सप्रेस जैसी ट्रेनें हाईजैक हो रही हैं।

भारत की संभावित रणनीति

भारत के लिए बलूचिस्तान में प्रॉक्सी वॉर एक जटिल लेकिन रणनीतिक अवसर हो सकता है। कुछ संभावित कदम:

  1. कूटनीतिक दबाव: भारत को संयुक्त राष्ट्र और अन्य मंचों पर बलूचिस्तान में मानवाधिकार उल्लंघन का मुद्दा उठाना चाहिए। मेहरान बलोच जैसे कार्यकर्ताओं को समर्थन देकर पाकिस्तान पर दबाव बनाया जा सकता है।
  2. अप्रत्यक्ष समर्थन: भारत विद्रोहियों को सीधे हथियार या प्रशिक्षण देने से बचे, लेकिन अफगानिस्तान या ईरान जैसे देशों के माध्यम से अप्रत्यक्ष समर्थन दे सकता है। अमेरिका ने 1980 के दशक में मुजाहिदीन को इसी तरह समर्थन दिया था।
  3. अंतरराष्ट्रीय समर्थन: अमेरिका, ईरान, और अफगानिस्तान जैसे देशों को बलूचिस्तान के रणनीतिक महत्व के बारे में समझाना होगा। अमेरिका का बलूचिस्तान में रुचि लेना भारत के लिए फायदेमंद हो सकता है, क्योंकि यह क्षेत्र तेल और भू-रणनीति के लिए महत्वपूर्ण है।
  4. विद्रोहियों की ताकत बढ़ाना: बलूच विद्रोहियों की संख्या और आत्मविश्वास बढ़ रहा है। भारत को उनकी भौगोलिक समझ और गुरिल्ला रणनीति का लाभ उठाने में मदद करनी चाहिए, जैसा कि बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में मुक्ति वाहिनी के साथ किया गया था।
  5. चीन को संतुलित करना: बलूचिस्तान में अस्थिरता CPEC और ग्वादर बंदरगाह को प्रभावित कर सकती है, जिससे चीन का प्रभाव कम होगा।

चुनौतियां और जोखिम

बलूचिस्तान में भारत की सक्रियता कई जोखिमों से भरी है:

  1. पाकिस्तान की सेना: 6 लाख सैनिकों वाली पाकिस्तानी सेना अभी भी बलूच विद्रोहियों से कहीं अधिक शक्तिशाली है।
  2. चीन का हस्तक्षेप: बलूचिस्तान में चीन का निवेश और रुचि भारत के लिए चुनौती है। चीन विद्रोह को दबाने के लिए पाकिस्तान का समर्थन कर सकता है।
  3. अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया: अगर भारत का हस्तक्षेप साबित होता है, तो यह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसकी छवि को नुकसान पहुंचा सकता है।
  4. जनसंख्या की कमी: बलूचिस्तान की कम जनसंख्या और डर का माहौल विद्रोह को बड़े पैमाने पर संगठित करना मुश्किल बनाता है।

आसिम मुनीर के भारत पर प्रॉक्सी वॉर के आरोप बिना सबूत के प्रचार का हिस्सा हैं। हालांकि, बलूचिस्तान में बढ़ता विद्रोह पाकिस्तान के लिए गंभीर चुनौती है। भारत के लिए यह एक रणनीतिक अवसर हो सकता है, लेकिन इसे सावधानी और कूटनीति के साथ संभालना होगा। बलूच विद्रोहियों की बढ़ती ताकत, स्थानीय असंतोष, और अंतरराष्ट्रीय समर्थन (अमेरिका, अफगानिस्तान, ईरान) भारत के पक्ष में हैं। फिर भी, बलूचिस्तान की आजादी एक लंबी और जटिल लड़ाई है, जिसमें भू-राजनीति, कूटनीति, और रणनीति का संतुलन जरूरी है।

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