बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की आहट के साथ ही मुजफ्फरपुर की सियासत गर्मा गई है। टिकट बंटवारे को लेकर दोनों प्रमुख गठबंधनों—एनडीए और इंडिया—में सीटों के बँटवारे को लेकर खींचतान शुरू हो गई है, जिसने जिले के नेताओं की चिंता बढ़ा दी है। कई नेताओं को अपनी सीट से हाथ धोना पड़ सकता है, तो कुछ को पार्टी के लिए ‘कुर्बानी’ देने की आशंका है।
एनडीए में सीटों की जटिल पहेली
जिले की कुल 11 सीटों पर वर्तमान में बीजेपी के 5, आरजेडी के 4 और कांग्रेस व जेडीयू के एक-एक विधायक हैं। हालाँकि, 2020 के चुनाव में एनडीए के घटक दलों—बीजेपी (5), जेडीयू (4) और वीआईपी (2)—ने मिलकर 11 में से 11 सीटें जीती थीं। वहीं, इंडिया गठबंधन के आरजेडी को 9 और कांग्रेस व माले को एक-एक सीट मिली थी।
इस बार एनडीए के लिए सबसे बड़ी चुनौती लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के गठबंधन में शामिल होने से पैदा हुई है। लोजपा अगर दो सीटों की मांग करती है, तो बीजेपी और जेडीयू को एक-एक सीट छोड़नी पड़ सकती है। इससे सबसे बड़ा खतरा बोचहां सीट पर मँडरा रहा है, जो पहले वीआईपी के पास थी और जहाँ वर्तमान में आरजेडी का विधायक है। इस पर बीजेपी भी दावा ठोक चुकी है। ऐसे में, किसी न किसी दल के नेता को ‘कुर्बान’ होना तय है।
कांटी और कुढ़नी: अदला-बदली का दबाव
सीटों की अदला-बदली को लेकर भी चर्चाएँ तेज हैं। कांटी सीट, जो पिछली बार जेडीयू के पास थी, पर बीजेपी के पूर्व मंत्री अजीत कुमार दावेदारी कर रहे हैं। अगर जेडीयू यह सीट बीजेपी को देती है, तो बदले में वह मुजफ्फरपुर नगर या कुढ़नी जैसी मजबूत सीट माँग सकती है। बीजेपी इन सीटों को छोड़ने को तैयार नहीं दिख रही, खासकर कुढ़नी जहाँ उनके वरिष्ठ मंत्री केदार प्रसाद गुप्ता सत्तारूढ़ हैं। इस गतिरोध से अजीत कुमार के नाराज होने और स्थिति को और उलझाने का खतरा है।
इंडिया गठबंधन: आरजेडी के सामने चुनौती
इंडिया गठबंधन में आरजेडी की प्रभुत्व वाली स्थिति के बावजूद, यहाँ भी चुनौतियाँ कम नहीं हैं। लोकसभा चुनाव में हार के बाद पार्टी के भीतर ‘भितरघात’ के आरोप लगे हैं, जिसके चलते पूर्वी मुजफ्फरपुर के एक विधायक के टिकट कटने की आशंका है।
एक बड़ा सवाल औराई सीट को लेकर है, जो पिछली बार माले के पास थी और जहाँ उम्मीदवार को भारी हार का सामना करना पड़ा था। आरजेडी इस सीट को अपने पास रखना चाहती है, जिससे माले के लिए दूसरी सीट तलाशना मुश्किल होगा और आरजेडी के किसी दूसरे नेता को टिकट छोड़ना पड़ सकता है। इसके अलावा, कांग्रेस बेहतर सीटों की माँग कर रही है, जिससे आरजेडी पर दबाव और बढ़ गया है।
निष्कर्ष: नेताओं की बढ़ी दहशत
इन सभी उलझनों ने मुजफ्फरपुर के नेताओं की धड़कनें तेज कर दी हैं। हर कोई अपनी सीट बचाने के लिए बड़े नेताओं के दरवाजे खटखटा रहा है। चुनाव आयोग के सितंबर में तारीखों की घोषणा करने की संभावना है, और उससे पहले सियासी समीकरणों का यह खेल और भी रोमांचक होने वाला है।