बीमारी बन गई है व्यवसाय
भारतीय स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में एक गंभीर समस्या उभर रही है – जहां मरीजों का इलाज नहीं बल्कि उनकी बीमारी से मुनाफा कमाया जा रहा है। यह एक ऐसा रैकेट है जिसमें डॉक्टर, फार्मास्युटिकल कंपनियां और मेडिकल स्टोर मिलकर आम आदमी को लूट रहे हैं।
जेनेरिक vs ब्रांडेड दवाओं का खेल
- ब्रांडेड दवाएं: एक ही साल्ट वाली दवा ₹80 में बेची जाती है
- जेनेरिक दवाएं: वही दवा सिर्फ ₹8 में उपलब्ध
- अंतर: सिर्फ पैकेजिंग और ब्रांड नाम का, असर एक समान
कैसे काम करता है यह रैकेट?
- डॉक्टर-फार्मा कंपनी गठजोड़:
- डॉक्टरों को विशिष्ट ब्रांड लिखने पर कमीशन
- गिफ्ट, विदेश यात्राएं और नकद लाभ
- उदाहरण: डोलो 650 केस में ₹1000 करोड़ के गिफ्ट का आरोप
- अस्पष्ट प्रिस्क्रिप्शन:
- जानबूझकर खराब हैंडराइटिंग
- केवल मेडिकल स्टोर वाला समझ सके
- मरीज को विकल्प न देना
- मेडिकल स्टोर की भूमिका:
- अधिक कमीशन वाली दवाएं बेचना
- जेनेरिक दवाओं को छिपाना
आंकड़ों में भयावह सच
- 5 करोड़ भारतीय हर साल दवाओं के खर्च से गरीबी रेखा के नीचे
- शहरी भारत: औसतन ₹55,000 सालाना दवाओं पर खर्च
- ग्रामीण भारत: ₹3,708 सालाना खर्च
- नवंबर 2022: देश ने दवाओं पर ₹1,000 करोड़ खर्च किए
सरकारी पहल और चुनौतियाँ
प्रधानमंत्री जन औषधि योजना
- 13,822 केंद्र
- 6100 करोड़ रुपये की सस्ती दवाएं बेचीं
- 300 करोड़ रुपये की बचत
नेशनल मेडिकल कमीशन का आदेश
- जेनेरिक दवाएं लिखना अनिवार्य
- न मानने पर लाइसेंस रद्द
आम आदमी क्या कर सकता है?
- डॉक्टर से साल्ट नाम पूछें, ब्रांड नहीं
- जन औषधि केंद्रों से दवाएं खरीदें
- दवा की पैकेजिंग नहीं, साल्ट कंपोजिशन चेक करें
- जागरूक बनें, सवाल पूछने से न हिचकिचाएं
अमेरिका से सबक
- 90% दवाएं जेनेरिक
- भारतीय कंपनियों द्वारा निर्मित
- लाखों करोड़ की बचत