सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) के तहत हटाए गए 65 लाख मतदाताओं की सूची सार्वजनिक करने का निर्देश दिया है, जिसमें हटाए जाने का कारण भी दिखाना है। साथ ही, वोटर पहचान के दस्तावेज़ों में आधार को मान्य करने की बात कही गई है। विपक्ष ने इस आदेश को लोकतंत्र की जीत और ‘वोट चोरों’ के लिए एक भयानक संदेश बताया है।
कांग्रेस ने कहा – “वोटरों के अधिकारों की रक्षा”
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस आदेश को “वोटरों के अधिकारों की बहाली” करार दिया। उन्होंने कहा, “यह आदेश उन लाखों मतदाताओं के लिए एक राहत है जिनके नाम मतदाता सूची से गलत तरीके से हटाए गए थे।”
कांग्रेस नेता के. सी. वेणुगोपाल ने कोर्ट के फैसले को “दिल को छू लेने वाला” बताते हुए कहा कि यह “वोट चोरों के लिए एक स्पष्ट संदेश है।”
आप और वाम दलों ने भी किया स्वागत
आम आदमी पार्टी (आप) ने भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश का समर्थन किया और इसे “मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा” से जोड़ा।
सीपीआई(एम) ने इस निर्णय को “आंशिक राहत” बताया, लेकिन साथ ही चेतावनी दी कि “मतदाता सूचियों में गड़बड़ी की आशंका अभी भी बनी हुई है।”
भाजपा ने कहा – “विपक्ष बहानेबाजी कर रहा”
भाजपा ने विपक्ष के दावों को खारिज करते हुए कहा कि यह “निराधार आरोप हैं।” पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, “चुनाव आयोग पूरी तरह पारदर्शिता के साथ काम कर रहा है। विपक्ष को बिना सबूत के आरोप लगाने की आदत है।”
क्या था सुप्रीम कोर्ट का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि वह मतदाता सूची से हटाए गए नामों की पूरी जानकारी सार्वजनिक करे। साथ ही, आधार को वोटर पहचान के लिए वैध दस्तावेज मानने का भी आदेश दिया गया।
राजनीतिक प्रभाव
यह फैसला ऐसे समय आया है जब विपक्ष चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग को लेकर सक्रिय है। विश्लेषकों का मानना है कि इससे आने वाले चुनावों में मतदाता सूचियों को लेकर विवाद कम होगा।
