मालदीव, एक छोटा सा द्वीपीय देश, जिसकी आबादी 6 लाख से भी कम है, ने भारत जैसे विशाल देश को चुनौती देने का दुस्साहस किया। मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू ने “इंडिया आउट” कैंपेन के जरिए सत्ता हासिल की, जिसका मुख्य उद्देश्य मालदीव में तैनात लगभग 88 भारतीय सैनिकों को हटाना था। इन सैनिकों को भारत ने सहायता के लिए तैनात किया था, जैसे कि हेलीकॉप्टर और हवाई जहाज के माध्यम से आपातकालीन सेवाएं प्रदान करना। मुइज्जू ने इस कैंपेन को इतनी ताकत से चलाया कि यह भारत के लिए एक बड़ी खबर बन गई। इस दौरान मालदीव ने परंपरा को तोड़ते हुए अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए भारत के बजाय चीन को चुना, जिससे भारत के साथ संबंधों में तनाव पैदा हुआ।
भारत की रणनीति और लक्षद्वीप का जवाब
मालदीव के इस रवैये का जवाब भारत ने अपनी रणनीति से दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लक्षद्वीप की यात्रा की और वहां के पर्यटन को बढ़ावा दिया, जिससे मालदीव का पर्यटन उद्योग बुरी तरह प्रभावित हुआ। 2023 में जहां 2 लाख भारतीय पर्यटक मालदीव गए थे, वहीं 2024 में यह संख्या घटकर मात्र 37,000 रह गई। भारत ने मालदीव को दी जाने वाली आर्थिक सहायता में भी 22% की कटौती की। इस आर्थिक दबाव ने मालदीव को अपनी गलती का एहसास कराया। मालदीव के मंत्रियों, जिन्होंने भारत के खिलाफ बयान दिए थे, को निलंबित करना पड़ा और भारत के साथ संबंध सुधारने की कोशिश शुरू हुई।
मालदीव की आर्थिक तंगी और चीन का जाल
मालदीव की अर्थव्यवस्था पहले से ही संकट में थी। 2026 में मालदीव को 1 बिलियन डॉलर का भुगतान करना है, जिसमें से एक बड़ा हिस्सा चीन को देना है। मालदीव ने चीन से भारी मात्रा में कर्ज लिया था, जिसके कारण वह आर्थिक संकट में फंस गया। मालदीव ने गल्फ देशों और तुर्की से भी मदद मांगी, लेकिन कोई ठोस समाधान नहीं मिला। इस बीच, भारत ने मालदीव को 400 मिलियन डॉलर की सहायता और 3000 करोड़ रुपये का करेंसी स्वैप प्रदान किया, जिससे मालदीव को थोड़ी राहत मिली। यह सहायता भारत की उस रणनीति का हिस्सा थी, जिसने मालदीव को यह एहसास दिलाया कि भारत से पंगा लेना महंगा पड़ सकता है।
मालदीव का यू-टर्न: गेस्ट ऑफ ऑनर के रूप में निमंत्रण
2025 में मालदीव के 60वें स्वतंत्रता दिवस पर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गेस्ट ऑफ ऑनर के रूप में आमंत्रित किया गया है। यह वही मालदीव है, जिसने कुछ समय पहले “इंडिया आउट” का नारा बुलंद किया था। अब भारत और मालदीव के बीच मुक्त व्यापार समझौते (फ्री ट्रेड एग्रीमेंट) की बातचीत चल रही है। यह निमंत्रण और समझौता मालदीव के लिए एक मजबूरी भी है और भारत की कूटनीतिक जीत भी। मालदीव ने समझ लिया कि भारत के बिना उसकी अर्थव्यवस्था और क्षेत्रीय स्थिरता खतरे में पड़ सकती है।
भारत की क्षेत्रीय रणनीति और मालदीव का महत्व
मालदीव हिंद महासागर में भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। भारत नहीं चाहता कि इस क्षेत्र में चीन या कोई अन्य देश हावी हो। मालदीव के साथ मजबूत संबंध बनाए रखना भारत की क्षेत्रीय सुरक्षा और प्रभाव के लिए जरूरी है। भारत और मालदीव के बीच 500 मिलियन डॉलर का व्यापार होता है, जिसमें भारत का निर्यात प्रमुख है। मालदीव को सीमेंट, लोहा और अन्य जरूरी सामान भारत से ही मिलते हैं। भारत ने यह सुनिश्चित किया है कि मालदीव उसकी मदद के बिना अपनी जरूरतें पूरी नहीं कर सकता।
विदेश नीति में भारत की सफलता
मालदीव का यह रुख बदलना भारत की विदेश नीति की सफलता का प्रतीक है। जो लोग भारत की विदेश नीति पर सवाल उठाते थे, खासकर पड़ोसी देशों को संभालने की क्षमता पर, उनके लिए यह एक करारा जवाब है। मालदीव के साथ-साथ भारत ने यूनाइटेड किंगडम के साथ भी हाल ही में एक मुक्त व्यापार समझौता किया है, जिससे भारत का 99% सामान ब्रिटेन में बिना कर के बिकेगा। यह भारत की कूटनीतिक और आर्थिक ताकत को दर्शाता है।
मालदीव का सबक और भारत का दबदबा
मालदीव की कहानी एक सबक है कि भारत जैसे बड़े और शक्तिशाली पड़ोसी से टकराव की कीमत चुकानी पड़ सकती है। मोहम्मद मुइज्जू, जो कभी “इंडिया आउट” के नारे के साथ सत्ता में आए थे, अब भारत के साथ दोस्ती की राह पर हैं। भारत ने अपनी कूटनीति, आर्थिक शक्ति और रणनीतिक चालों से मालदीव को यह दिखा दिया कि हिंद महासागर में भारत का दबदबा कायम रहेगा। मालदीव का यह यू-टर्न न केवल उसकी मजबूरी को दर्शाता है, बल्कि भारत की क्षेत्रीय और वैश्विक ताकत को भी रेखांकित करता है।
