श्रीनगर: पाकिस्तान-समर्थित आतंकी हमलों के जवाब में भारत ने सिंधु जल संधि (IWT) के तहत अपने अधिकारों का पूर्ण उपयोग करते हुए एक बड़ा कदम उठाया है। 40 वर्षों की देरी के बाद, अब जम्मू-कश्मीर के रामबन जिले में चिनाब नदी पर 1856 मेगावाट क्षमता वाले सावलकोट हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट के निर्माण का फैसला लिया गया है।
पहलगाम आतंकी हमले (अप्रैल 2025) के बाद सिंधु जल संधि (IWT) को निलंबित करने के भारत के फैसले ने इस परियोजना को फिर से शुरू करने का रास्ता साफ किया। यह प्रोजेक्ट न केवल जम्मू-कश्मीर के विकास को गति देगा, बल्कि पाकिस्तान पर जल और रणनीतिक दबाव भी बढ़ाएगा। आइए, इस प्रोजेक्ट की पूरी कहानी, इसके महत्व, और सिंधु जल संधि के संदर्भ में इसके प्रभाव को समझते हैं।
परियोजना का विवरण
- स्थान: रामबन जिला, जम्मू-कश्मीर (सिद्धू गांव के पास, चिनाब नदी पर)
- क्षमता: 1,856 मेगावाट (कुछ स्रोतों में 10,856 मेगावाट का दावा, जो संभवतः अतिशयोक्ति या भविष्य की योजनाओं का हिस्सा हो सकता है)
- बांध का प्रकार: रोलर कॉम्पैक्टेड कंक्रीट (RCC) ग्रेविटी डैम
- बांध की ऊंचाई: 192.5 मीटर
- डिज़ाइन: रन-ऑफ-द-रिवर (नदी के प्राकृतिक बहाव से बिजली उत्पादन, बिना बड़े पैमाने पर जल भंडारण)
- लागत: अनुमानित 22,704 करोड़ रुपये
- निर्माण मॉडल: BOOT (Build, Own, Operate, Transfer) – 40 वर्ष बाद जम्मू-कश्मीर को हस्तांतरित
- प्रमुख संस्थाएं: नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉर्पोरेशन (NHPC) और जम्मू-कश्मीर पावर डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (JKPDC)
- टेंडर: ग्लोबल टेंडर 29 जुलाई 2025 को जारी, अंतिम तिथि 10 सितंबर 2025
प्रोजेक्ट की विशेषताएं
- तीन सुरंगें: 965 मीटर, 1,130 मीटर, और 1,280 मीटर लंबी सुरंगें नदी के पानी को मोड़ने के लिए
- पर्यावरणीय प्रभाव: रन-ऑफ-द-रिवर डिज़ाइन के कारण न्यूनतम पर्यावरणीय प्रभाव
- क्षेत्रीय लाभ:
- जम्मू-कश्मीर में बिजली आपूर्ति में सुधार
- हजारों रोजगार अवसर
- सड़क, पुल, और ट्रांसमिशन नेटवर्क का विकास
- राष्ट्रीय ग्रिड में अतिरिक्त बिजली
- रणनीतिक महत्व: चिनाब नदी के जल प्रवाह पर भारत का नियंत्रण, जो सिंधु जल संधि के तहत पाकिस्तान को आवंटित है
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
- प्रारंभिक योजना: 1960 के दशक में केंद्रीय जल आयोग ने इसकी कल्पना की थी
- विलंब के कारण:
- सिंधु जल संधि (1960) की पाबंदियां: चिनाब नदी पर भंडारण-आधारित प्रोजेक्ट्स पर रोक
- पाकिस्तान का विरोध: जल प्रवाह पर प्रभाव का हवाला
- प्रशासनिक और पर्यावरणीय अड़चनें
- पुनरारंभ: अप्रैल 2025 में पहलगाम हमले के बाद सिंधु जल संधि के निलंबन ने प्रोजेक्ट को गति दी
सिंधु जल संधि और सावलकोट
- संधि का ढांचा:
- पूर्वी नदियां (रावी, ब्यास, सतलुज): भारत को पूर्ण नियंत्रण
- पश्चिमी नदियां (सिंधु, झेलम, चिनाब): पाकिस्तान को 80% जल उपयोग का अधिकार
- भारत को पश्चिमी नदियों पर सीमित कृषि, गैर-उपभोग्य उपयोग, और रन-ऑफ-द-रिवर प्रोजेक्ट्स की अनुमति
- नए प्रोजेक्ट्स के लिए 6 महीने का नोटिस और डेटा साझा करना अनिवार्य
- संधि का निलंबन (अप्रैल 2025):
- पहलगाम हमले (26 लोगों की मौत) के बाद भारत ने पाकिस्तान पर आतंकवाद को समर्थन का आरोप लगाते हुए संधि को स्थगित किया
- नोटिस और डेटा साझा करने की बाध्यता समाप्त
- सावलकोट जैसे प्रोजेक्ट्स को बिना पाकिस्तान की मंजूरी के शुरू करने का रास्ता साफ
पाकिस्तान पर प्रभाव
- जल निर्भरता: पाकिस्तान की कृषि और हाइड्रो पावर का बड़ा हिस्सा सिंधु बेसिन (विशेष रूप से चिनाब) पर निर्भर
- संभावित प्रभाव:
- सिंचाई सीजन में जल उपलब्धता में कमी
- हाइड्रो पावर उत्पादन में बाधा
- सूखे जैसे हालात की आशंका
- पाकिस्तान का विरोध: सावलकोट, किशनगंगा, और बगलिहार जैसे प्रोजेक्ट्स को लेकर पहले भी आपत्तियां; दावा कि ये जल प्रवाह को प्रभावित करते हैं
भारत के लिए लाभ
- ऊर्जा सुरक्षा: 1,856 मेगावाट की क्षमता जम्मू-कश्मीर की बिजली जरूरतों को पूरा करेगी
- आर्थिक विकास: रोजगार सृजन, बुनियादी ढांचे का विकास
- रणनीतिक बढ़त: पश्चिमी नदियों पर नियंत्रण बढ़ाकर पाकिस्तान पर दबाव
- पर्यावरण मंजूरी: जुलाई 2025 में पर्यावरण मंत्रालय ने 3,000 एकड़ वन भूमि के हस्तांतरण को मंजूरी दी
- अंतरराष्ट्रीय भागीदारी: ग्लोबल टेंडर से दिग्गज कंपनियों की भागीदारी, जो भारत की तकनीकी क्षमता को प्रदर्शित करेगी
चुनौतियां
- पुनर्वास: करीब एक दर्जन गांव प्रभावित होंगे; सैकड़ों परिवारों का पुनर्वास जरूरी
- तकनीकी जटिलताएं: 192.5 मीटर ऊंचे बांध और तीन सुरंगों का निर्माण चुनौतीपूर्ण
- पाकिस्तान का विरोध: अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शिकायत की संभावना
- पर्यावरणीय चिंताएं: हालांकि रन-ऑफ-द-रिवर डिज़ाइन पर्यावरण पर कम प्रभाव डालता है, फिर भी स्थानीय पारिस्थितिकी पर नजर रखना जरूरी
सावलकोट हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट भारत की ऊर्जा और रणनीतिक नीतियों का एक मास्टरस्ट्रोक है। यह न केवल जम्मू-कश्मीर के विकास को गति देगा, बल्कि सिंधु जल संधि के निलंबन के बाद चिनाब नदी पर भारत के नियंत्रण को मजबूत करेगा। पाकिस्तान के लिए यह एक रणनीतिक झटका है, क्योंकि उसकी जल और ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है। अगर यह प्रोजेक्ट समय पर पूरा होता है, तो भारत की हाइड्रो पावर क्षमता में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होगी, और कश्मीर की आर्थिक-सामाजिक तस्वीर बदल जाएगी।
