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Myntra पर ED का कार्रवाई: 1654 करोड़ के FEMA उल्लंघन का आरोप

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Last updated: July 24, 2025 4:44 pm
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ED action on Myntra: Accused of FEMA violation of Rs 1654 crore
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भारत की प्रमुख ऑनलाइन फैशन कंपनी Myntra अब प्रवर्तन निदेशालय (ED) के रडार पर है। ED ने Myntra Designs Pvt. Ltd. और उसकी सहयोगी कंपनियों के खिलाफ विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA) के तहत 1654 करोड़ रुपये के वित्तीय उल्लंघन का मामला दर्ज किया है। जांच में पाया गया कि Myntra समूह ने भारत की विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) नीतियों का उल्लंघन करते हुए होलसेल व्यापार दिखाकर रिटेल कारोबार चलाया।

भारत की अर्थव्यवस्था में कॉर्पोरेट धोखाधड़ी और वित्तीय अनियमितताओं के मामले बार-बार सुर्खियां बटोर रहे हैं। हाल ही में, ऑनलाइन फैशन रिटेल कंपनी मिंत्रा (Myntra) को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट (फेमा) के उल्लंघन के लिए ₹1,654 करोड़ की नोटिस जारी की है। इसके साथ ही, केंद्र सरकार ने संसद में खुलासा किया कि 1,629 कॉरपोरेट कर्जदारों ने सरकारी बैंकों से ₹1.62 लाख करोड़ का कर्ज नहीं चुकाया, जिन्हें विलफुल डिफॉल्टर्स घोषित किया गया है। इस लेख में हम मिंत्रा पर ईडी की कार्रवाई, विलफुल डिफॉल्टर्स की समस्या, और भारतीय बैंकिंग सिस्टम की स्थिति को विस्तार से समझेंगे।

मिंत्रा पर ईडी की नोटिस: क्या है मामला

23 जुलाई 2025 को ईडी ने मिंत्रा डिजाइन प्राइवेट लिमिटेड और उसकी सहयोगी कंपनी वेक्टर ई-कॉमर्स प्राइवेट लिमिटेड को फेमा 1999 के तहत ₹1,654 करोड़ के उल्लंघन के लिए कारण बताओ नोटिस जारी किया। मिंत्रा, जो फ्लिपकार्ट के स्वामित्व में है, पर आरोप है कि उसने विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) नियमों का उल्लंघन किया।

फेमा उल्लंघन का आरोप

भारत में मल्टी-ब्रांड रिटेल ट्रेडिंग में एफडीआई पर सख्त शर्तें लागू हैं। मिंत्रा को मिला विदेशी निवेश केवल थोक व्यापार (होलसेल कैश एंड कैरी) के लिए मंजूर किया गया था, जिसमें कंपनी को सिर्फ अन्य व्यवसायों को सामान बेचने की अनुमति थी, न कि सीधे उपभोक्ताओं को। लेकिन ईडी का दावा है कि मिंत्रा ने इन नियमों को दरकिनार करते हुए एक जटिल ढांचा बनाया।

  • शेल कंपनी का खेल: मिंत्रा ने अपनी सहयोगी कंपनी वेक्टर ई-कॉमर्स को इंटरमीडियरी बनाकर थोक व्यापार के नाम पर सामान बेचा। वेक्टर ने इन उत्पादों को ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए सीधे उपभोक्ताओं को रिटेल में बेचा, जो एफडीआई नीति का स्पष्ट उल्लंघन है।
  • नियमों की अनदेखी: नियमों के अनुसार, थोक व्यापार करने वाली कंपनी अपनी कुल बिक्री का केवल 25% अपनी ग्रुप कंपनियों को बेच सकती है। मिंत्रा ने लगभग पूरी बिक्री वेक्टर को ट्रांसफर की, जिसने इसे उपभोक्ताओं को बेचा।
  • नियंत्रण का दुरुपयोग: हालांकि वेक्टर ने बिक्री की, लेकिन विज्ञापन, मूल्य निर्धारण, और बिक्री के निर्णय मिंत्रा के पास थे, जो नियमों की धज्जियां उड़ाने जैसा है।

ईडी ने फेमा की धारा 16(1) के तहत कार्रवाई शुरू की है, और यह मामला फेमा एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी के पास भेजा गया है, जो जुर्माना और व्यक्तिगत जवाबदेही तय करेगी।

विलफुल डिफॉल्टर्स: बैंकों का पैसा दबाने वाले

वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने 22 जुलाई 2025 को राज्यसभा में बताया कि 31 मार्च 2025 तक 1,629 कॉरपोरेट कर्जदारों ने सरकारी बैंकों का ₹1.62 लाख करोड़ का कर्ज नहीं चुकाया। ये विलफुल डिफॉल्टर्स हैं, यानी ऐसे व्यक्ति या कंपनियां जो जानबूझकर कर्ज नहीं लौटाते, भले ही उनके पास पर्याप्त संपत्ति या आय हो।

विलफुल डिफॉल्टर कौन हैं

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के नियमों के अनुसार, विलफुल डिफॉल्टर वे हैं जो:

  • कर्ज चुकाने की क्षमता होने के बावजूद उसे नहीं लौटाते।
  • कर्ज के पैसे को गलत जगह (जैसे निजी संपत्ति खरीदने) में डायवर्ट करते हैं।
  • गलत वित्तीय जानकारी देकर लोन लेते हैं।
  • कर्ज चुकाने के लिए संपत्ति बेचने से इनकार करते हैं।

उदाहरण के लिए, अगर कोई व्यवसायी ₹100 करोड़ का कर्ज साबुन फैक्ट्री के लिए लेता है, लेकिन उस पैसे से निजी संपत्ति खरीदता है और कर्ज नहीं चुकाता, तो उसे विलफुल डिफॉल्टर माना जाएगा।

बड़े विलफुल डिफॉल्टर्स

2024 में इंडियन एक्सप्रेस द्वारा आरबीआई से प्राप्त आरटीआई डेटा के अनुसार, कुछ प्रमुख विलफुल डिफॉल्टर्स हैं:

  1. गीतांजलि जेम्स: मेहुल चौकसी और नीरव मोदी की कंपनी, जिस पर ₹8,516 करोड़ का बकाया है। दोनों प्रमोटर 2018 में भारत से भाग गए थे।
  2. एबीजी शिपयार्ड: ₹4,684 करोड़ का बकाया।
  3. कॉनकास्ट स्टील एंड पावर: ₹435 करोड़ का बकाया। इसके मालिक संजय सुरेखा को 2024 में ईडी ने गिरफ्तार किया था।
  4. एरा इंफ्रा इंजीनियरिंग और रोटोमैक ग्लोबल: इन कंपनियों पर भी भारी बकाया है।

सरकारी बैंकों की स्थिति: एनपीए और राइट-ऑफ

भारतीय बैंकिंग सिस्टम में गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां (एनपीए) पिछले कुछ वर्षों में कम हुई हैं। 2024-25 में ग्रॉस एनपीए 2.6% के आसपास है, जो पहले के 7-8% से काफी कम है। लेकिन विलफुल डिफॉल्टर्स की समस्या ने बैंकों पर भारी दबाव डाला है।

बैंकों का राइट-ऑफ

इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2024-25 में सरकारी बैंकों ने ₹58,000 करोड़ से अधिक के एनपीए को राइट-ऑफ किया। राइट-ऑफ एक लेखा प्रक्रिया है, जिसमें बैंक उन कर्जों को अपने खातों से हटाते हैं, जिनके चुकने की संभावना कम होती है। यह कर्ज माफी नहीं है, बल्कि बैलेंस शीट को साफ करने का तरीका है।

  • राइट-ऑफ के फायदे: बैंकों को टैक्स छूट मिलती है, और वे अपनी पूंजी को नए कर्ज के लिए उपयोग कर सकते हैं।
  • नुकसान: राइट-ऑफ से बैंकों की बैलेंस शीट साफ दिखती है, लेकिन वास्तविक वसूली की प्रक्रिया धीमी रहती है।

सरकार के कदम

सरकार और आरबीआई विलफुल डिफॉल्टर्स पर नकेल कसने के लिए कई कदम उठा रहे हैं:

  1. कानूनी कार्रवाई: बैंकों को आपराधिक शिकायत दर्ज करने की अनुमति है।
  2. नए लोन पर रोक: डिफॉल्टर्स को 5 साल तक नया लोन या व्यवसाय शुरू करने की अनुमति नहीं है।
  3. पूंजी बाजार पर प्रतिबंध: डिफॉल्टर्स की कंपनियां शेयर बाजार से पूंजी नहीं जुटा सकतीं।
  4. संपत्ति जब्ती: फ्यूजिटिव इकोनॉमिक ऑफेंडर्स एक्ट और पीएमएलए के तहत ₹15,298 करोड़ की संपत्ति जब्त की गई है, और ₹2,586 करोड़ बैंकों को लौटाए गए हैं।
  5. पारदर्शिता: आरबीआई ने बैंकों को ₹25 लाख से अधिक के विलफुल डिफॉल्टर्स की मासिक सूची सिविल और एक्सपेरियन जैसी क्रेडिट एजेंसियों को साझा करने का निर्देश दिया है।

बैंकों और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

विलफुल डिफॉल्टर्स की वजह से बैंकिंग सिस्टम में एक तरह का वित्तीय रुकावट पैदा हो रहा है। यह पैसा छोटे व्यवसायों, किसानों, या अन्य जरूरतमंदों तक पहुंच सकता था। पब्लिक सेक्टर बैंकों को सबसे ज्यादा नुकसान हो रहा है, क्योंकि यह जनता का पैसा है। एनपीए की समस्या ने बैंकों की उधार देने की क्षमता को सीमित किया है, जिसका असर अर्थव्यवस्था की तरलता पर पड़ता है।

मिंत्रा पर ईडी की नोटिस और विलफुल डिफॉल्टर्स की समस्या भारतीय कॉर्पोरेट और बैंकिंग क्षेत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही की जरूरत को उजागर करती है। मिंत्रा का मामला एफडीआई नियमों के दुरुपयोग का उदाहरण है, जबकि विलफुल डिफॉल्टर्स की ₹1.62 लाख करोड़ की बकाया राशि बैंकों के लिए गंभीर चुनौती है। सरकार और आरबीआई के सख्त कदमों के बावजूद, वसूली की प्रक्रिया धीमी है। इन समस्याओं का समाधान करने के लिए कठोर कानूनी कार्रवाई, बेहतर निगरानी, और नीतिगत सुधारों की जरूरत है, ताकि भारतीय बैंकिंग सिस्टम और अर्थव्यवस्था मजबूत बनी रहे।

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