भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल की हालिया बीजिंग यात्रा ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में खासा ध्यान आकर्षित किया है। यह यात्रा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत और चीन के बीच बढ़ते राजनयिक संवाद की निरंतरता को दर्शाती है। डोभाल ने चीन के विदेश मंत्री वांग यी सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के साथ उच्च स्तरीय वार्ता की, जिसमें द्विपक्षीय संबंधों और क्षेत्रीय सुरक्षा मुद्दों पर चर्चा हुई।
इस बैठक के दौरान भारत ने स्पष्ट रूप से आतंकवाद के मुद्दे पर चीन से दोहरे मापदंड छोड़ने का आग्रह किया। यह संदेश विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह चीन की धरती पर दिया गया। भारत का यह रुख इस बात को रेखांकित करता है कि वह आतंकवाद के खिलाफ अपनी स्थिति पर कोई समझौता नहीं करेगा, खासकर तब जब चीन पाकिस्तान को सैन्य सहायता जारी रखे हुए है।
चीन के भारत में राजदूत ने इस बैठक को “सकारात्मक प्रगति” बताया है। दिलचस्प बात यह है कि चीन लगातार भारत-चीन-रूस (आरआईसी) त्रिपक्षीय सहयोग को मजबूत करने की बात कर रहा है। हालांकि, भारत का ध्यान मुख्य रूप से सीमा विवाद के समाधान और क्षेत्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने पर है। विश्लेषकों का मानना है कि डोभाल की यह यात्रा आगामी शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन की तैयारियों का हिस्सा भी हो सकती है।
एससीओ शिखर सम्मेलन इस साल चीन में होने वाला है, जहां रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ सहित कई नेताओं के शामिल होने की उम्मीद है। सवाल यह उठता है कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस सम्मेलन में भाग लेंगे। यह निर्णय भारत-चीन संबंधों की दिशा के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
रूस ने हाल ही में भारत के साथ 2030 तक के दीर्घकालिक सहयोग की योजना की घोषणा की है, जिसमें ऊर्जा, रक्षा और विनिर्माण जैसे क्षेत्र शामिल हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि रूस भारत और चीन के बीच संबंधों को सुधारने में मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है। हालांकि, भारत की प्राथमिकता सीमा विवाद के समाधान और चीन द्वारा पाकिस्तान को दी जा रही सैन्य सहायता को रोकने पर है।
अजित डोभाल की बीजिंग यात्रा और आगामी एससीओ शिखर सम्मेलन भारत की विदेश नीति के लिए महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हो सकते हैं। जबकि चीन “ड्रैगन और हाथी के साथ नृत्य” की बात करता है, भारत व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाते हुए अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने पर केंद्रित है। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट हो जाएगा कि क्या दोनों देश वास्तव में एक सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ पाते हैं।
