उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के अचानक इस्तीफे ने भारतीय राजनीति में हलचल मचा दी है। सोमवार, 21 जुलाई 2025 को मानसून सत्र के पहले दिन तक धनखड़ सांसदों के साथ बैठकें कर रहे थे, और कोई स्वास्थ्य समस्या का जिक्र नहीं था। लेकिन रात 9 बजे के आसपास उनका इस्तीफा सामने आया, जिसने अटकलों का बाजार गर्म कर दिया। इस इस्तीफे के पीछे जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव, विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच टकराव, किसानों के मुद्दे और कुछ व्यक्तिगत कारणों को जोड़ा जा रहा है। आइए, इस पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं।
मानसून सत्र का पहला दिन और जस्टिस वर्मा का मामला
मानसून सत्र का पहला दिन कई महत्वपूर्ण मुद्दों के लिए चर्चा में था। ऑपरेशन सिंदूर पर बहस की संभावना थी, लेकिन सबसे ज्यादा ध्यान जस्टिस वर्मा के मामले ने खींचा। दिल्ली हाईकोर्ट के जज जस्टिस वर्मा के घर से कथित तौर पर 15 करोड़ रुपये नकद जलने की खबर ने सुर्खियां बटोरी थीं। इस मामले में उनके खिलाफ जजेस इंक्वायरी एक्ट 1968 के तहत महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी थी। इस प्रस्ताव को लोकसभा में 100 सांसदों या राज्यसभा में 50 सांसदों के समर्थन की जरूरत थी। प्रस्ताव स्वीकार होने पर संबंधित सदन का अध्यक्ष (लोकसभा स्पीकर या राज्यसभा चेयरमैन) तीन सदस्यों की एक जांच समिति बनाता, जिसमें एक सुप्रीम कोर्ट जज, एक हाईकोर्ट जज और एक प्रख्यात विधिवेत्ता शामिल होता।
लोकसभा और राज्यसभा में प्रस्ताव का खेल
सोमवार को लोकसभा में 145 सांसदों ने स्पीकर ओम बिरला के सामने जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव रखा। वहीं, राज्यसभा में विपक्षी सांसदों ने भी उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के सामने ऐसा ही प्रस्ताव पेश किया। लेकिन यहां खेल शुरू हुआ। सत्ता पक्ष को जब पता चला कि विपक्ष ने राज्यसभा में प्रस्ताव रख दिया है, जिसमें उनके सांसदों के हस्ताक्षर नहीं थे, तो रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के आवास पर देर रात एक बैठक बुलाई गई। इसमें सत्ता पक्ष के सांसदों से हस्ताक्षर करवाकर प्रस्ताव को मजबूत करने की कोशिश की गई। जजेस इंक्वायरी एक्ट के अनुसार, जिस सदन में प्रस्ताव पहले स्वीकार होता है, वही जांच समिति बनाता है। लेकिन दोनों सदनों में एक ही दिन प्रस्ताव आने से यह तय करना मुश्किल हो गया कि जांच समिति कौन बनाएगा।
धनखड़ और जस्टिस वर्मा का पुराना विवाद
जगदीप धनखड़ इस मामले में जस्टिस वर्मा के खिलाफ मुखर रहे हैं। मार्च 2025 में जस्टिस वर्मा के घर से 15 करोड़ रुपये जलने की घटना सामने आई थी, लेकिन सात दिन बाद तक यह खबर दबा दी गई। धनखड़ ने अप्रैल, मई और जून में कई मंचों से इस मुद्दे को उठाया, सवाल किया कि इतनी बड़ी राशि किसकी थी, इसे क्यों दबाया गया, और कोई FIR क्यों दर्ज नहीं हुई। उनका कहना था कि यह न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सवाल उठाता है। धनखड़ चाहते थे कि इस मामले की जांच में उनकी भूमिका हो, और वह यह तय करें कि समिति में कौन शामिल होगा। लेकिन लोकसभा में प्रस्ताव पहले पहुंचने से उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हुई, जिससे टकराव की स्थिति बनी।
बिजनेस एडवाइजरी कमेटी की बैठक में अनुपस्थिति
मानसून सत्र के पहले दिन बिजनेस एडवाइजरी कमेटी (BAC) की बैठक में भी विवाद देखने को मिला। इस बैठक में संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू और राज्यसभा में सत्ता पक्ष के नेता जेपी नड्डा को शामिल होना था, लेकिन दोनों ने 4:30 बजे की बैठक में हिस्सा नहीं लिया। जयराम रमेश के अनुसार, इस बैठक को अगले दिन दोपहर 1 बजे के लिए टाल दिया गया। इस बीच, लोकसभा में जस्टिस वर्मा के खिलाफ प्रस्ताव ओम बिरला के पास पहुंच चुका था। धनखड़ को यह बात नागवार गुजरी कि उनकी अध्यक्षता वाली बैठक में सत्ता पक्ष के प्रमुख नेता अनुपस्थित रहे।
किसानों के मुद्दे पर धनखड़ की सक्रियता
धनखड़ ने हाल के दिनों में किसानों के मुद्दों पर भी सक्रियता दिखाई थी। उन्होंने केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान से सार्वजनिक रूप से सवाल किया था कि किसानों से किए वादे कब पूरे होंगे। एक वायरल वीडियो में धनखड़ ने मुंबई में केंद्रीय कपास प्रौद्योगिकी अनुसंधान केंद्र में यह मुद्दा उठाया था। वह खुद को “किसान पुत्र जाट नेता” के रूप में पेश करते रहे हैं, लेकिन कुछ विश्लेषकों का मानना है कि उनकी यह सक्रियता सत्ता पक्ष को पसंद नहीं आई। साथ ही, अमेरिका द्वारा भारत में जीएम फसलों और मांसाहारी दूध के दबाव के खिलाफ उनकी मुखरता भी एक कारण हो सकती है।
नड्डा के साथ टकराव
सदन के पहले दिन धनखड़ और जेपी नड्डा के बीच भी तल्खी देखी गई। नड्डा ने सदन में कहा, “जो मैं कहूंगा, वही रिकॉर्ड पर जाएगा,” जिसे धनखड़ ने चेयरमैन की भूमिका को दरकिनार करने के रूप में लिया। यह बयान उस समय आया जब विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे को बोलने का समय दिया गया था, लेकिन वह अन्य मुद्दों पर बोलने लगे। नड्डा का यह रवैया धनखड़ को अपमानजनक लगा, जिसने उनके इस्तीफे की अटकलों को और हवा दी।
प्रधानमंत्री का ट्वीट और स्वास्थ्य का सवाल
22 जुलाई 2025 को दोपहर 5:15 बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर धनखड़ के अच्छे स्वास्थ्य की कामना की और उनकी सेवाओं की सराहना की। लेकिन इस ट्वीट में इस्तीफे के कारणों का कोई जिक्र नहीं था, और इसे देर से आने के कारण कुछ विश्लेषकों ने नाखुशी का संकेत माना। धनखड़ ने इस्तीफे में स्वास्थ्य कारणों का हवाला दिया, लेकिन उसी दिन शाम 6 बजे तक वह सक्रिय थे। यह सवाल उठता है कि क्या स्वास्थ्य कारण केवल एक बहाना था?
जयपुर यात्रा और इस्तीफे की टाइमिंग
धनखड़ की 23 जुलाई को जयपुर यात्रा प्रस्तावित थी, जिसका सर्कुलर 21 जुलाई को ही जारी हुआ था। ऐसे में रात को अचानक इस्तीफा देना कई सवाल खड़े करता है। कुछ लोग इसे सत्ता पक्ष के दबाव से जोड़ रहे हैं, तो कुछ इसे उनकी उम्र (74 वर्ष) और आरएसएस की 75 वर्ष की रिटायरमेंट नीति से जोड़कर देख रहे हैं। यह नीति पहले लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे नेताओं पर लागू हो चुकी है। क्या धनखड़ ने इस नीति के तहत इस्तीफा दिया, या यह एक बड़ा राजनीतिक संदेश था?
विपक्ष का रुख और वरुण ग्रोवर का ट्वीट
विपक्ष ने धनखड़ के इस्तीफे को सत्ता पक्ष के दबाव से जोड़ा। कांग्रेस ने ट्वीट कर सवाल उठाया कि क्या बोलने वालों को इस्तीफा देना पड़ता है? वरुण ग्रोवर के व्यंग्यात्मक ट्वीट, “क्या जगदीप जी को पता है कि उन्होंने इस्तीफा दे दिया है?” ने सोशल मीडिया पर तहलका मचा दिया। विपक्ष ने इसे मौके के रूप में लिया, खासकर तब जब धनखड़ पहले उनके निशाने पर रहे थे। पिछले साल सांसदों के निलंबन और टीएमसी की आलोचना जैसे मामलों में विपक्ष ने धनखड़ की आलोचना की थी। लेकिन उनके इस्तीफे के बाद विपक्ष ने उन्हें सहानुभूति का पात्र बनाने की कोशिश की।
अब उपराष्ट्रपति कौन?
संविधान के अनुसार, उपराष्ट्रपति का पद रिक्त होने पर यथाशीघ्र नया चुनाव होना चाहिए, लेकिन कोई निश्चित समयसीमा नहीं है। फिलहाल राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश (जेडीयू) सदन की कार्यवाही संभाल सकते हैं। मानसून सत्र में नए उपराष्ट्रपति का चुनाव संभव नहीं लगता, लेकिन अगले सत्र से पहले यह प्रक्रिया शुरू हो सकती है।
निष्कर्ष
जगदीप धनखड़ का इस्तीफा कई सवाल खड़े करता है। क्या यह जस्टिस वर्मा के मामले में उनकी सक्रियता का नतीजा था? क्या सत्ता पक्ष के साथ टकराव और नड्डा की टिप्पणी ने उन्हें अपमानित महसूस कराया? या फिर किसानों के मुद्दे पर उनकी मुखरता सत्ता पक्ष को नागवार गुजरी? उनकी उम्र और आरएसएस की नीति भी एक कोण हो सकता है। वरुण ग्रोवर का ट्वीट हो या विपक्ष का रुख, यह साफ है कि धनखड़ का इस्तीफा केवल स्वास्थ्य कारणों तक सीमित नहीं है। यह एक राजनीतिक खेल का हिस्सा हो सकता है, जिसके जवाब आने वाले दिनों में मिल सकते हैं।
