भारत ने हाल ही में अपनी रक्षा क्षमताओं को और मजबूत करते हुए अग्नि-5 मिसाइल को एक बंकर बस्टिंग हथियार के रूप में विकसित किया है, जो जमीन के 300 फीट नीचे तक घुसकर विस्फोट करने में सक्षम है। यह मिसाइल 7.5 टन उच्च विस्फोटक सामग्री ले जाने की क्षमता रखती है, जो इसे पाकिस्तान या अन्य दुश्मन देशों के गहरे बंकरों और न्यूक्लियार सुविधाओं को नष्ट करने में प्रभावी बनाती है। इसके साथ ही, भारत 2029 तक 52 सैन्य निगरानी उपग्रह लॉन्च करने की योजना पर तेजी से काम कर रहा है, जो पाकिस्तान, चीन और हिंद महासागर क्षेत्र पर नजर रखेंगे। दूसरी ओर, चीन ने भी अपनी सैन्य ताकत का प्रदर्शन करते हुए ब्लैकआउट बम और अति छोटे ड्रोन विकसित किए हैं, जो बिजली ग्रिड को ठप कर सकते हैं और गुप्त निगरानी में सक्षम हैं। आइए, इन हथियारों और भारत-ब्राजील रक्षा सहयोग की विस्तार से चर्चा करते हैं।
सबसे पहले बात करते हैं भारत की अग्नि-5 मिसाइल की, जिसे अब बंकर बस्टिंग क्षमता के साथ उन्नत किया गया है। मूल रूप से इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) के तौर पर डिज़ाइन की गई अग्नि-5 की मारक क्षमता 5,000 किलोमीटर से अधिक थी, लेकिन इसे जानबूझकर 2,500 किलोमीटर तक सीमित किया गया है। इसका कारण है कि भारत को पाकिस्तान और चीन के उन कमांड सेंटर्स और न्यूक्लियार सुविधाओं को निशाना बनाना है, जो इस रेंज के भीतर हैं। रेंज कम करने से मिसाइल में अतिरिक्त ईंधन और बूस्टर की जगह को 7.5 टन उच्च विस्फोटक सामग्री के लिए उपयोग किया गया है। यह मिसाइल 80-100 मीटर (लगभग 300 फीट) तक प्रबलित कंक्रीट और मिट्टी को भेद सकती है, जो इसे अमेरिका की GBU-57 बंकर बस्टिंग मिसाइल के समकक्ष या उससे भी अधिक विनाशकारी बनाती है। यह मिसाइल हाइपरसोनिक गति से हमला करती है, जो ध्वनि की गति से आठ गुना तेज है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत ने यह महसूस किया कि बंकर बस्टिंग क्षमता की जरूरत है, क्योंकि दुश्मन देश गहरे भूमिगत ठिकानों में अपनी सुविधाएं छिपाते हैं। यह मिसाइल बिना किसी स्ट्रैटेजिक बॉम्बर की जरूरत के भारत के दक्षिणी या मध्य क्षेत्रों से लॉन्च की जा सकती है, जो किराना हिल्स जैसे पाकिस्तानी न्यूक्लियार ठिकानों को पूरी तरह नष्ट करने में सक्षम है।
अब बात करते हैं भारत के अंतरिक्ष निगरानी कार्यक्रम की। टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत 2029 तक 52 समर्पित सैन्य उपग्रह लॉन्च करने की योजना बना रहा है, जिसमें पहला लॉन्च अप्रैल 2026 में होगा। इस परियोजना की लागत 26,968 करोड़ रुपये है और इसका मकसद पाकिस्तान, चीन और हिंद महासागर क्षेत्र पर निरंतर निगरानी करना है। इन उपग्रहों की खासियत होगी उनकी उच्च रिज़ॉल्यूशन और कम रिविज़िट समय, यानी ये हर 4-8 घंटे में किसी क्षेत्र की तस्वीरें ले सकेंगे। इससे दुश्मन की गतिविधियों को छिपाना लगभग असंभव हो जाएगा। इसरो 21 उपग्रह बनाएगा, जबकि 31 निजी कंपनियां बनाएंगी, जो भारत की अंतरिक्ष युद्ध क्षमता में निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी को दर्शाता है। ये उपग्रह सेना, नौसेना और वायुसेना को पाकिस्तान और चीन की हर गतिविधि पर नजर रखने में मदद करेंगे, जैसे कि चीनी जहाजों की आवाजाही या अन्य सैन्य गतिविधियां।
भारत की रक्षा ताकत को और बढ़ाने के लिए ब्राजील के साथ सहयोग भी बढ़ रहा है। ब्राजील, जो BRICS का महत्वपूर्ण सदस्य है, भारत से कई हथियार खरीदना चाहता है, खास तौर पर आकाश मिसाइल सिस्टम और गरुड़ आर्टिलरी गन। विदेश मंत्रालय के सचिव (पूर्व) पी. कुमारन ने बताया कि ब्राजील के साथ रक्षा सहयोग पर चर्चा चल रही है, जिसमें संयुक्त अनुसंधान, तकनीकी हस्तांतरण और प्रशिक्षण आदान-प्रदान शामिल है। ब्राजील आकाश मिसाइल सिस्टम में विशेष रुचि दिखा रहा है, जो 25 किलोमीटर की रेंज में बैलिस्टिक मिसाइल, ड्रोन, हेलीकॉप्टर, क्रूज़ मिसाइल या विमानों जैसे हवाई खतरों को एक साथ नष्ट कर सकता है। यह सिस्टम सेना और वायुसेना दोनों द्वारा उपयोग किया जाता है और ऑपरेशन सिंदूर में इसकी प्रभावशीलता साबित हो चुकी है। इसके अलावा, गरुड़ 105 मिमी की गन है, जो वाहन पर लगी होती है और 17-20 किलोमीटर तक गोले दाग सकती है। इसकी ‘शूट एंड स्कूट’ क्षमता इसे बेहद प्रभावी बनाती है, क्योंकि यह गोले दागने के बाद तुरंत स्थान बदल सकती है, जिससे दुश्मन का जवाबी हमला बेअसर हो जाता है। ब्राजील इसके अलावा ऑफशोर गश्ती जहाजों (OPV) और तटीय निगरानी सिस्टम में भी रुचि रखता है। भारत के 95% नौसैनिक जहाज और हथियार स्वदेशी हैं, जो ब्राजील के लिए आकर्षक है।
दूसरी ओर, चीन भी अपनी सैन्य क्षमताओं को तेजी से बढ़ा रहा है। उसने हाल ही में 1.3 सेंटीमीटर लंबा एक माइक्रो ड्रोन विकसित किया है, जिसका वजन केवल 0.3 ग्राम है। यह ड्रोन अल्ट्रा-मिनिएचर कैमरा, माइक्रोफोन और सेंसर से लैस है, जो चुपके से निगरानी कर सकता है। यह मक्खी की तरह किसी कमरे में घुसकर बातचीत रिकॉर्ड कर सकता है और लाइव डेटा भेज सकता है, बिना किसी को पता चले। यह ड्रोन रडार से बचने में सक्षम है और इनडोर मिशनों के लिए डिज़ाइन किया गया है। इसे नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ डिफेंस टेक्नोलॉजी ने विकसित किया है और इसे चीनी सैन्य चैनल CCTV7 पर प्रदर्शित किया गया। इसके अलावा, चीन ने ब्लैकआउट बम विकसित किया है, जो रासायनिक रूप से उपचारित कार्बन फिलामेंट्स छोड़ता है। ये फिलामेंट्स बिजली ग्रिड, रडार, सर्वर, कंप्यूटर और संचार लाइनों को शॉर्ट-सर्किट कर पूरे क्षेत्र की बिजली आपूर्ति ठप कर सकते हैं। इस बम का वॉरहेड 490 किलोग्राम है और इसकी रेंज 290 किलोमीटर है। यह युद्ध में दुश्मन के संचार और आपूर्ति तंत्र को नष्ट करने की रणनीति का हिस्सा है।
भारत की ये नई रक्षा पहल और चीन की उन्नत तकनीकें हथियारों की होड़ को दर्शाती हैं। भारत को अपनी रक्षा प्रणालियों को और मजबूत करने की जरूरत है, खासकर ब्लैकआउट बम जैसे हथियारों से बचाव के लिए बिजली ग्रिड को सुरक्षित करना और ड्रोन निगरानी का जवाब देने के लिए उन्नत तकनीक विकसित करना। अग्नि-5 और 52 उपग्रहों की योजना भारत को दक्षिण एशिया में रणनीतिक ताकत प्रदान करेगी, जबकि ब्राजील जैसे देशों के साथ सहयोग भारत के हथियार निर्यात को बढ़ावा देगा। यह नया दौर भारत की सैन्य और तकनीकी शक्ति को वैश्विक मंच पर और मजबूत करेगा।