2025 की पहली छमाही में अमेरिकी डॉलर ने ऐसी गिरावट देखी है, जो पिछले पांच दशकों में शायद ही कभी देखने को मिली हो। डॉलर इंडेक्स में 10.8% की भारी गिरावट दर्ज की गई है, जो 1973 के बाद इसका सबसे खराब प्रदर्शन है। यह वही साल था जब गोल्ड ब्रेटन वुड्स सिस्टम टूटा, जिसके तहत डॉलर और अन्य मुद्राओं की कीमत सोने के आधार पर तय होती थी। इस गिरावट ने न केवल अमेरिकी अर्थव्यवस्था बल्कि वैश्विक आर्थिक परिदृश्य पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। दिलचस्प बात यह है कि इस दौरान अमेरिकी शेयर बाजार, जैसे S&P 500 और नैस्डैक, रिकॉर्ड ऊंचाइयों पर हैं, लेकिन डॉलर की कमजोरी की वजह से विदेशी निवेशकों की कमाई पर असर पड़ रहा है। यानी शेयर बाजार में मुनाफा हो रहा है, लेकिन करेंसी में घाटा। तो आइए, आसान और सरल भाषा में समझते हैं कि आखिर डॉलर की इस हालत के पीछे कारण क्या हैं और इसका भारत सहित पूरी दुनिया पर क्या असर पड़ सकता है।
डॉलर की गिरावट के मुख्य कारण
- अमेरिकी आर्थिक नीतियों पर संदेह: राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा आयात शुल्क (टैरिफ) बढ़ाने, बजट घाटे में वृद्धि और फेडरल रिजर्व पर ब्याज दरें कम करने के दबाव ने डॉलर पर विश्वास को कमजोर किया है।
- मुद्रा बाजार में बदलाव: स्विस फ्रैंक, यूरो, येन और पाउंड के मुकाबले डॉलर 9-14% तक गिरा है, जो वैश्विक निवेशकों के लिए चिंता का संकेत है।
- सोने की बढ़ती मांग: डॉलर के कमजोर होने के साथ, सोना वैश्विक रिजर्व में 23% हिस्सेदारी के साथ 30 साल के शिखर पर पहुंच गया है। चीन, भारत और तुर्की जैसे देश अपने सोने के भंडार बढ़ा रहे हैं।
भारत और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
- निर्यातकों को फायदा: डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति मजबूत होने से भारतीय निर्यातकों को लाभ हो सकता है।
- विदेशी निवेश पर असर: डॉलर में गिरावट से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) को रिटर्न पर दबाव बढ़ सकता है।
- सोने की भूमिका: भारत जैसे सोना-आयात करने वाले देशों के लिए सोने की बढ़ती कीमतें चुनौती पैदा कर सकती हैं।
क्या डॉलर का दबदबा खत्म हो रहा है?
1993 के बाद पहली बार वैश्विक रिजर्व में डॉलर की हिस्सेदारी घटकर 44% रह गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बहु-मुद्रा प्रणाली (multi-currency system) की ओर बढ़ने का संकेत है, जहां सोना और अन्य मुद्राएं (जैसे युआन) अहम भूमिका निभाएंगी।
डॉलर की गिरावट वैश्विक आर्थिक शक्ति के संतुलन में बदलाव का संकेत देती है। भविष्य में सोना और अन्य मुद्राएं डॉलर के विकल्प के रूप में उभर सकती हैं। अगर आपको यह विश्लेषण पसंद आया तो हमारे चैनल को फॉलो करें। क्या आपको लगता है कि सोना डॉलर को पीछे छोड़ देगा? कमेंट में अपनी राय जरूर बताएं