
हिमाचल हाईकोर्ट ने दिया बड़ा बयान: “मातृत्व अवकाश जिम्मेदारी है, विलासिता नहीं”
महिला कर्मचारियों के अधिकारों पर मील का पत्थर साबित होगा यह फैसला
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने 4 जून 2025 को एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट किया कि मातृत्व अवकाश के दौरान महिला कर्मचारियों को उच्च वेतनमान से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 का उल्लंघन है। यह फैसला देश भर में कार्यरत महिला कर्मचारियों के लिए एक बड़ी राहत लेकर आया है।
मामले का संक्षिप्त विवरण
पृष्ठभूमि
- याचिकाकर्ता: हिमाचल प्रदेश की एक महिला क्लर्क
- मामला: 2 वर्ष की सेवा पूरी होने से पहले मातृत्व अवकाश लेने पर उच्च वेतनमान से वंचित किया गया
- सरकार का तर्क: मातृत्व अवकाश को “ड्यूटी पर न होने” के रूप में देखा गया
न्यायालय का महत्वपूर्ण निर्देश
- 1 जुलाई 2019 का सरकारी आदेश रद्द
- याचिकाकर्ता को 12 मई 2019 से उच्च वेतनमान के लाभ का हकदार घोषित
- 6% वार्षिक ब्याज के साथ 15 जुलाई 2025 तक राशि का भुगतान सुनिश्चित करने का आदेश
न्यायालय की प्रमुख टिप्पणियाँ
1. “मातृत्व अवकाश जिम्मेदारी है, विलासिता नहीं”
जस्टिस विवेक सिंह ठाकुर और जस्टिस रंजन शर्मा की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि मातृत्व अवकाश एक सामाजिक दायित्व की पूर्ति है, न कि अवकाश का बहाना।
2. सेवा अवधि में गिना जाएगा मातृत्व अवकाश
कोर्ट ने निर्धारित किया कि मातृत्व अवकाश की अवधि को सेवा काल में शामिल किया जाएगा और इसे “नॉन-ड्यूटी” नहीं माना जा सकता।
3. लैंगिक समानता पर बल
न्यायालय ने कहा कि मातृत्व संबंधी भेदभाव संविधान के समानता के अधिकार का उल्लंघन है।
फैसले का व्यापक प्रभाव
सरकारी क्षेत्र में
- हिमाचल प्रदेश सरकार को अपने मातृत्व अवकाश नियमों में संशोधन करना होगा
- समान मामलों में फैसले का पूर्वदृष्टांत (precedent) के रूप में उपयोग
निजी क्षेत्र के लिए संदेश
- कॉर्पोरेट जगत को मातृत्व लाभ नीतियों की समीक्षा करनी होगी
- वेतन वृद्धि और पदोन्नति में मातृत्व अवकाश को आधार न बनाने की बाध्यता
सामाजिक महत्व
“यह फैसला केवल एक कानूनी निर्णय नहीं, बल्कि भारतीय समाज में महिलाओं की गरिमा को मान्यता देने वाला एक दस्तावेज है।”
— महिला अधिकार कार्यकर्ता डॉ. मीनाक्षी अरोड़ा
इस निर्णय से निम्नलिखित बदलावों की उम्मीद की जा सकती है:
- कार्यस्थलों पर महिला-अनुकूल नीतियों का विकास
- लैंगिक भेदभाव के खिलाफ कानूनी प्रक्रियाओं को बल
- मातृत्व संरक्षण को लेकर सामाजिक जागरूकता में वृद्धि
हिमाचल हाईकोर्ट का यह फैसला भारत के श्रम कानूनों में एक नए युग की शुरुआत कर सकता है, जहाँ मातृत्व को कमजोरी नहीं, बल्कि एक सामाजिक दायित्व के रूप में देखा जाएगा।
