दिल्ली पुलिस की मनमानी और बिना सबूत गिरफ्तारी का एक और मामला सामने आया है। इस बार उत्तम नगर थाने की पुलिस ने एक 20 साल के स्टूडेंट को बिना FIR के ही हिरासत में ले लिया। लेकिन जब यह केस कोर्ट पहुंचा, तो पुलिस अपने ही जाल में फंस गई। द्वारका सेशंस कोर्ट ने न सिर्फ स्टूडेंट को जमानत दी, बल्कि उत्तम नगर थाने के SHO समेत आठ पुलिसकर्मियों के खिलाफ जांच के आदेश भी दे दिए। आइए जानते हैं इस चौंकाने वाले मामले की पूरी कहानी।
बिना FIR के गिरफ्तारी, फिर कोर्ट में पोल खुली
7 जुलाई को दिल्ली पुलिस ने 20 साल के एक स्टूडेंट को रॉबरी के आरोप में गिरफ्तार किया। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इस मामले में FIR दो दिन बाद, यानी 8 जुलाई को दर्ज की गई। स्टूडेंट का कहना है कि यह सब एक सुनियोजित साजिश थी। उसने बताया, “जीवन पार्क के पास कुछ शराब माफिया से मेरे दोस्तों का झगड़ा हुआ। वो लोग हमें मारने लगे, तो हम डर के मारे वहां से भाग गए। लेकिन बाद में पुलिस ने हमें पकड़ लिया और थाने ले गई।”
पुलिस ने न सिर्फ स्टूडेंट को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में लिया, बल्कि उसे तीन दिन तक रिमांड पर रखा। इस दौरान पुलिस ने कथित तौर पर स्टूडेंट की पिटाई की और जबरदस्ती उससे रॉबरी का जुर्म कबूल करवाया। स्टूडेंट ने बताया, “पुलिस ने मेरे दोस्तों के हाथ में पिस्तौल और मेरे हाथ में चाकू देकर वीडियो बनाया। डर के मारे हमने वो सब कबूल कर लिया, जो पुलिस ने कहा।”
CCTV ने खोली पुलिस की पोल
इस पूरे मामले में ट्विस्ट तब आया, जब स्टूडेंट के घर के बाहर लगे CCTV फुटेज सामने आए। इन फुटेज में साफ दिखा कि पुलिस ने 7 जुलाई को ही स्टूडेंट को बिना किसी गिरफ्तारी वारंट के पकड़ लिया। कोर्ट ने जब पुलिस से इस बारे में सबूत मांगे, तो उनके पास कोई ठोस जवाब नहीं था। जज ने सवाल किया, “अगर आपने 7 तारीख को गिरफ्तार किया, तो 10 तारीख तक स्टूडेंट को कहां रखा?” पुलिस इस सवाल का जवाब नहीं दे पाई। CCTV में दिख रहे पुलिसकर्मियों के नाम पूछे गए, लेकिन वहां भी पुलिस चुप रही।
कोर्ट ने लगाई फटकार, SHO पर जांच के आदेश
द्वारका सेशंस कोर्ट के जज ने पुलिस की इस लापरवाही पर कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने न सिर्फ स्टूडेंट को जमानत दी, बल्कि उत्तम नगर थाने के SHO और आठ अन्य पुलिसकर्मियों के खिलाफ जांच के आदेश दिए। कोर्ट ने SHO से इस मामले में रिपोर्ट मांगी, लेकिन SHO ने दो बार समय लेने के बावजूद कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि 7 से 10 जुलाई तक स्टूडेंट को कहां रखा गया, इसका कोई रिकॉर्ड नहीं है।
जज ने इस पूरे मामले को दिल्ली पुलिस कमिश्नर को भेज दिया और 5 अगस्त तक जांच पूरी कर रिपोर्ट पेश करने को कहा। कोर्ट ने यह भी जानना चाहा कि किन पुलिसकर्मियों ने ड्यूटी में लापरवाही बरती, किन्होंने गैरकानूनी तरीके से गिरफ्तारी की, और किन्होंने दो दिन बाद FIR दर्ज कर फर्जी केस बनाया।
पुलिस और शराब माफिया का गठजोड़
इस केस ने दिल्ली पुलिस और कुछ अवैध कारोबारियों के बीच कथित गठजोड़ की पोल भी खोल दी। स्टूडेंट का दावा है कि शराब माफिया के साथ झगड़े के बाद पुलिस ने उन्हें जानबूझकर फंसाया। यह पहला मौका नहीं है, जब दिल्ली पुलिस पर फर्जी केस में लोगों को फंसाने का आरोप लगा हो। इस मामले ने एक बार फिर सवाल उठाए हैं कि क्या पुलिस आम लोगों की सुरक्षा के लिए है या फिर अपराधियों के साथ मिलकर मनमानी करती है?
दिल्ली पुलिस को अब कोर्ट के सामने जवाब देना होगा। 5 अगस्त को कमिश्नर की रिपोर्ट से साफ होगा कि इस मामले में कितने पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई होगी। साथ ही यह केस एक बार फिर दिल्ली पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठा रहा है। क्या इस जांच से पुलिस की मनमानी पर लगाम लगेगी? यह तो वक्त ही बताएगा।
