न्यूज डेस्क, रीटाइम्स इंडिया
प्रकाशित: गुरुवार, 07 अगस्त 2025
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर 25% अतिरिक्त टैरिफ लगाकर हड़कंप मचा दिया है। यह टैरिफ मौजूदा 25% टैरिफ के साथ मिलकर कुल 50% हो जाएगा, जो 27 अगस्त से लागू होगा। व्हाइट हाउस का कहना है कि यह कदम इसलिए उठाया गया, क्योंकि भारत रूस से तेल खरीद रहा है। लेकिन सवाल यह है कि जब चीन, तुर्की और यूरोप के कई देश भी रूस से तेल खरीद रहे हैं, तो ट्रंप का निशाना सिर्फ भारत क्यों? विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे कई और वजहें हैं। आइए, जानते हैं उन पांच बड़े कारणों को, जो ट्रंप की भारत के प्रति नाराजगी की वजह बन रहे हैं।
1. ब्रिक्स को लेकर नाराजगी
रूस के कजान में हाल ही में हुए ब्रिक्स सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात ने सुर्खियां बटोरी थीं। ब्रिक्स, जिसमें भारत, चीन, रूस, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, ईरान, इथियोपिया, इंडोनेशिया, मिस्र और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं, एक उभरता हुआ आर्थिक समूह है। यह समूह डॉलर पर निर्भरता कम करने की बात करता है, जो ट्रंप को बिल्कुल पसंद नहीं।
ट्रंप ने ब्रिक्स देशों को 100% टैरिफ की धमकी दी है, यह कहते हुए कि अगर ये देश अपनी करेंसी शुरू करते हैं, तो उन्हें अमेरिकी व्यापार से बाहर होना पड़ेगा। रूस पर पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद चीन रूबल में तेल खरीद रहा है, और ब्रिक्स का बढ़ता दायरा अमेरिका को डराने लगा है।
फोर स्कूल ऑफ मैनेजमेंट के प्रोफेसर फैसल अहमद कहते हैं, “ब्रिक्स में ईरान जैसे देशों का शामिल होना और लोकल करेंसी की बात अमेरिका को परेशान कर रही है। टैरिफ बढ़ाकर वह भारत जैसे देशों की अर्थव्यवस्था को कमजोर करना चाहता है ताकि डॉलर का दबदबा बना रहे।”
वहीं, गेटवे हाउस की फेलो नयनिमा बासु का कहना है, “ब्रिक्स के बाकी देश कई बदलाव चाहते हैं, लेकिन भारत का सुस्त रवैया इसे कमजोर करता है। फिर भी, भारत को टैरिफ का निशाना बनाया जा रहा है।”
2. ट्रेड डील में अड़ंगा
अमेरिका लंबे समय से भारत के साथ व्यापारिक समझौता करना चाहता है। ट्रंप के पहले कार्यकाल में भी यह कोशिश हुई, लेकिन बात नहीं बनी। ट्रंप का मानना है कि भारत के साथ ट्रेड डील से अमेरिका को भारतीय बाजारों में ज्यादा पहुंच मिलेगी। लेकिन कुछ मुद्दों पर सहमति नहीं बन पा रही।
नयनिमा बासु बताती हैं, “भारत ने ट्रेड डील के वादों से कदम पीछे खींच लिए हैं, क्योंकि अमेरिका भारतीय बाजार में ज्यादा छूट मांग रहा है।” भारत और अमेरिका के बीच 8 अरब डॉलर का कृषि व्यापार है, जिसमें भारत चावल और मसाले निर्यात करता है, जबकि अमेरिका से मेवे, सेब और दालें आयात करता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर भारत अमेरिका को रियायत देता है, तो वह न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर फसलों की खरीद को प्रभावित कर सकता है, जो भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा मुद्दा है।
3. चीन के साथ बढ़ती नजदीकी
2020 में गलवान घाटी में भारत-चीन सैन्य झड़प के बाद दोनों देशों के रिश्ते तनावपूर्ण थे। लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। पीएम मोदी 31 अगस्त से 1 सितंबर तक शंघाई सहयोग संगठन (SCO) समिट के लिए चीन जाएंगे। पिछले साल कजान में ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान मोदी और शी जिनपिंग की मुलाकात हुई थी। जून 2025 में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी बीजिंग गए थे। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी चीन का दौरा किया।
जामिया मिल्लिया इस्लामिया की प्रोफेसर रेशमी काजी कहती हैं, “अमेरिका को चीन से चुनौती मिल रही है। उसे भारत की जरूरत है, लेकिन भारत और चीन के बीच सुधरते रिश्ते उसे पसंद नहीं आ रहे।”
नयनिमा बासु का कहना है, “कैलाश मानसरोवर यात्रा फिर शुरू हो गई है। जल्द ही दिल्ली-बीजिंग के बीच सीधी उड़ानें और वीजा नियमों में ढील हो सकती है। यह सब ट्रंप को परेशान कर रहा है। रूस से तेल खरीद सिर्फ एक बहाना है।”
4. ऑपरेशन सिंदूर का श्रेय न मिलना
पिछले कार्यकाल में ट्रंप भारत के प्रति नरम दिखते थे, लेकिन इस बार उनका रवैया सख्त है। भारत के ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद पाकिस्तान ने जवाबी कार्रवाई की थी, जिसके बाद दोनों देशों ने संघर्षविराम किया। ट्रंप दावा करते हैं कि यह संघर्षविराम उन्होंने कराया, लेकिन भारत ने साफ कहा कि इसमें अमेरिका की कोई भूमिका नहीं थी।
नयनिमा बासु कहती हैं, “ट्रंप चाहते थे कि पीएम मोदी उन्हें ऑपरेशन सिंदूर का श्रेय दें या कम से कम एक फोन कॉल करें, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।” प्रोफेसर रेशमी काजी का मानना है कि ट्रंप शांति का नोबेल पुरस्कार चाहते हैं। वह कहती हैं, “पाकिस्तान, कंबोडिया और इजरायल जैसे देशों ने ट्रंप के लिए नोबेल की मांग की, लेकिन भारत ने इस पर चुप्पी साध रखी है।”
5. नॉन-टैरिफ बैरियर्स
अमेरिका लंबे समय से भारत के नॉन-टैरिफ बैरियर्स (गैर-टैरिफ अवरोध) को लेकर नाराज है। प्रोफेसर फैसल अहमद बताते हैं, “टैरिफ का मतलब आयात-निर्यात पर कर है, जबकि नॉन-टैरिफ में आयात की मात्रा सीमित करना, लाइसेंसिंग, और गुणवत्ता नियम शामिल हैं। अमेरिका इन नियमों में छूट चाहता है।”
वह कहते हैं, “भारत एक विकासशील देश है, जबकि अमेरिका विकसित है। भारत का फोकस अपनी मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ाने पर है, लेकिन अमेरिका इसे अपने लिए बाधा मानता है।”
