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बिहार बना देश का पहला राज्य जहां मोबाइल से होगी ई-वोटिंग

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Last updated: July 2, 2025 4:11 pm
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बिहार देश का पहला राज्य बनने जा रहा है जहां 28 जून 2025 को नगर पालिका चुनाव में मोबाइल के माध्यम से ई-वोटिंग की जाएगी। यह एक अभूतपूर्व कदम है, जिसका उद्देश्य मतदान प्रक्रिया को सरल, सुगम और अधिक समावेशी बनाना है। इस पहल के पीछे मुख्य कारण बिहार से होने वाला भारी पलायन है। राज्य के लाखों लोग रोजगार या अन्य कारणों से दिल्ली, मुंबई, हरियाणा, महाराष्ट्र जैसे अन्य राज्यों में रहते हैं। इस वजह से वे अपने गृह राज्य में होने वाले चुनावों में हिस्सा नहीं ले पाते, जिसके परिणामस्वरूप मतदान प्रतिशत में कमी आती है। सरकार ने इस समस्या का समाधान करने के लिए ई-वोटिंग की शुरुआत की है, ताकि प्रवासी मतदाता अपने स्मार्टफोन के माध्यम से वोट डाल सकें और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग ले सकें।

इस पहल का शुभारंभ छोटे स्तर पर किया जा रहा है, जिसमें आठ नगर पालिकाओं – पटना, पूर्वी चंपारण, रोहतास, गया, बक्सर, बांका, सारण और सिवान में ई-वोटिंग की सुविधा उपलब्ध होगी। कुल 5155 मतदाताओं ने इसके लिए पंजीकरण कराया है, जिसमें 2638 पुरुष और 2517 महिलाएं शामिल हैं। सबसे अधिक पंजीकरण बक्सर से हुए हैं। यह प्रणाली विशेष रूप से वरिष्ठ नागरिकों, दिव्यांगों, गंभीर रूप से बीमार व्यक्तियों, गर्भवती महिलाओं और प्रवासी मजदूरों के लिए लाभकारी होगी, जो पारंपरिक मतदान केंद्रों तक पहुंचने में असमर्थ होते हैं।

ई-वोटिंग प्रक्रिया को सुचारू बनाने के लिए दो मोबाइल ऐप विकसित किए गए हैं – ‘सेक बीएचआर’ और ‘सेक बिहार’। सामान्य चुनावों के लिए ‘सेक बीएचआर’ और उपचुनावों के लिए ‘सेक बिहार’ का उपयोग होगा। ये ऐप केवल पंजीकृत मोबाइल नंबर पर ही काम करेंगे, और एक मोबाइल नंबर से अधिकतम दो लोग वोट डाल सकते हैं। मतदान का समय सुबह 7 बजे से शाम 5 बजे तक निर्धारित है। इस प्रणाली से न केवल मतदान प्रक्रिया आसान होगी, बल्कि प्रशासनिक खर्चों और संसाधनों की बचत होगी। साथ ही, गर्मी या अन्य मौसमी कठिनाइयों में मतदाताओं को लंबी कतारों में खड़े होने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

हालांकि, इस पहल के सामने कई चुनौतियां भी हैं। बिहार में टेली-डेंसिटी 57.23% और इंटरनेट डेंसिटी 42.1% है, जो राष्ट्रीय औसत से कम है। ग्रामीण क्षेत्रों में विशेष रूप से महिलाएं और बुजुर्ग स्मार्टफोन या इंटरनेट से वंचित हैं। तकनीकी जागरूकता की कमी भी एक बड़ी बाधा है, क्योंकि कई लोगों को ऐप डाउनलोड करने या ऑनलाइन पंजीकरण की प्रक्रिया समझने में कठिनाई हो सकती है। इसके अलावा, साइबर सुरक्षा एक प्रमुख चिंता का विषय है। हैकिंग, डेटा लीक और मतदाता सत्यापन जैसे मुद्दों को हल करने के लिए मजबूत तकनीकी ढांचे की आवश्यकता है। निर्वाचन आयोग ने इस संबंध में सावधानियां बरतने की सलाह दी है, जैसे ओटीपी साझा न करना और संदिग्ध लिंक से बचना।

दुनियाभर में ई-वोटिंग का उपयोग करने वाले देशों में एस्टोनिया अग्रणी है, जहां 2005 से ही यह प्रणाली सफलतापूर्वक लागू है। 2021 के संसदीय चुनाव में वहां 46.9% मतदाताओं ने ई-वोटिंग का उपयोग किया। स्विट्जरलैंड, फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में भी प्रवासी नागरिकों, दिव्यांगों और ग्रामीण मतदाताओं के लिए इस प्रणाली का आंशिक उपयोग किया जाता है। हालांकि, भारत जैसे विकासशील देश में साक्षरता दर, तकनीकी पहुंच और साइबर सुरक्षा जैसे मुद्दों के कारण इसे लागू करना चुनौतीपूर्ण है।

नोटा (नन ऑफ द अबव) का विकल्प भी इस प्रक्रिया में उपलब्ध होगा, जिसके माध्यम से मतदाता किसी भी उम्मीदवार को चुनने से इनकार कर सकते हैं। हालांकि, नोटा को लेकर विवाद रहा है, क्योंकि अगर इसे सबसे अधिक वोट मिलते हैं, तब भी किसी उम्मीदवार को विजयी घोषित करना पड़ता है। यह लोकतंत्र के सिद्धांतों पर सवाल उठाता है, क्योंकि मतदाताओं की इच्छा को पूरी तरह से प्रतिबिंबित नहीं करता।

इस नई पहल को लागू करने के लिए सरकार को जागरूकता अभियान चलाने, तकनीकी प्रशिक्षण प्रदान करने और ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट और स्मार्टफोन की पहुंच बढ़ाने की आवश्यकता है। शुरुआत में पारंपरिक और ऑनलाइन मतदान दोनों विकल्प उपलब्ध रखने होंगे, ताकि सभी वर्गों को शामिल किया जा सके। यह कदम निश्चित रूप से क्रांतिकारी है, लेकिन इसके सफल कार्यान्वयन के लिए सामाजिक और तकनीकी चुनौतियों का समाधान जरूरी है। बिहार की यह पहल भविष्य में देश के अन्य राज्यों के लिए भी एक मिसाल बन सकती है।

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