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उत्तर प्रदेश में प्रेम विवाह औरअंतर-धार्मिक विवाह पंजीकरण के नियम बदल गये

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Last updated: June 10, 2025 5:44 pm
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Rules for love marriage or inter-religious marriage registration changed in Uttar Pradesh
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उत्तर प्रदेश के हालिया विवाह पंजीकरण नियमों में बदलाव ने व्यक्तिगत अधिकारों, माता-पिता की सहमति और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (जो जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देता है) की व्याख्या पर गर्म बहस छेड़ दी है। नए नियमों के तहत, यूपी में जोड़े बिना माता-पिता की अनुमति के अपना विवाह पंजीकृत या कोर्ट मैरिज नहीं करा सकते। यह एक गंभीर सवाल खड़ा करता है: क्या यह नियम किसी व्यक्ति के अपने जीवनसाथी चुनने के अधिकार का उल्लंघन है, जो अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित है?

Contents
यूपी के नए विवाह पंजीकरण नियमों में मुख्य बदलावये बदलाव क्यों लाए गए?विवाद: क्या यह अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है?

यूपी के नए विवाह पंजीकरण नियमों में मुख्य बदलाव

पारिवारिक सहमति अनिवार्य
विवाह पंजीकरण के दौरान कम से कम एक रक्त संबंधी (माता-पिता, भाई-बहन, दादा-दादी) मौजूद होना चाहिए।
अब दोस्तों को गवाह के रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा, जिससे जांच सख्त होगी।


सेल्फ-मैरिज (स्वयं विवाह) के लिए वीडियो प्रमाण
अगर परिवार विवाह का विरोध करता है, तो जोड़े को शादी की वैधता साबित करने के लिए विवाह समारोह का वीडियो प्रमाण देना होगा।


पुजारी/मौलवी का शपथ पत्र
विवाह कराने वाले (पुजारी, मौलवी या रजिस्ट्रार) को शादी की पुष्टि करते हुए एक शपथ पत्र देना होगा, साथ ही दंपति के पहचान प्रमाण भी जमा करने होंगे।


स्थानीय क्षेत्राधिकार
विवाह का पंजीकरण केवल उसी जिले में होगा जहां माता-पिता रहते हैं, ताकि “अन्य जगह जाकर शादी करने” पर रोक लग सके।

ये बदलाव क्यों लाए गए?

यूपी सरकार और इलाहाबाद हाई कोर्ट का तर्क है कि ये नियम निम्नलिखित उद्देश्यों से लाए गए हैं:

  1. झूठे विवाह (लव जिहाद, फर्जी पहचान, जबरदस्ती) रोकने के लिए।
  2. महिलाओं को शोषण से बचाना, खासकर अंतरधर्मी या अंतरजातीय विवाह में जब पुरुष अपनी असली पहचान छुपाते हैं।
  3. कानूनी विवाद कम करना, जहां नाबालिग लड़कियों (भले ही 18+ हों) से शादी करने के बाद परिवार पुरुष पर POCSO के तहत केस कर देते हैं।

विवाद: क्या यह अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है?

अनुच्छेद 21 में निजता का अधिकार, गरिमा और व्यक्तिगत पसंद शामिल है, जिसमें बिना सरकारी या पारिवारिक दखल के शादी करने की आज़ादी भी शामिल है। आलोचकों के अनुसार:

  1. माता-पिता की सहमति व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर भारी पड़ती है—18+ महिलाएं और 21+ पुरुष कानूनी तौर पर शादी कर सकते हैं, लेकिन नए नियमों में परिवार की मंजूरी अनिवार्य कर दी गई है।
  2. निजता पर चोट—शादी का वीडियो प्रमाण मांगना व्यक्तिगत आज़ादी में दखल है।
  3. दुरुपयोग की आशंका—जो परिवार अंतरजातीय/अंतरधर्मी विवाह के खिलाफ हैं, वे इन नियमों का इस्तेमाल जोड़ों को प्रताड़ित करने के लिए कर सकते हैं।

कानूनी और सामाजिक प्रभाव

  1. सुप्रीम कोर्ट हस्तक्षेप कर सकता है—पिछले फैसलों (जैसे शफीन जहान बनाम अशोकन केएम और केएस पुट्टास्वामी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया) में अनुच्छेद 21 के तहत शादी के अधिकार को मान्यता दी गई है।
  2. भागकर शादी/आत्महत्या के मामले बढ़ सकते हैं—सख्त नियमों के कारण विरोध झेल रहे जोड़े चरम कदम उठा सकते हैं।
  3. लैंगिक पक्षपात—महिलाओं को ज्यादा खतरा (ऑनर किलिंग, जबरन शादी, परित्याग)।

अन्य विवाह कानूनों से तुलना

  1. हिंदू मैरिज एक्ट (1955)—स्वयंवर विवाह की अनुमति, लेकिन पंजीकरण जरूरी।
  2. स्पेशल मैरिज एक्ट (1954)—अंतरधर्मी विवाह के लिए, 30 दिन का नोटिस पीरियड (जिसका अक्सर दुरुपयोग होता है)।
  3. मुस्लिम पर्सनल लॉ—विवाह को एक अनुबंध (निकाहनामा) मानता है, जहां पंजीकरण कम सख्त है।

आगे क्या?

इस नियम को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती मिलने की संभावना है, जहां सामाजिक व्यवस्था (धोखाधड़ी रोकने) और व्यक्तिगत अधिकार (अनुच्छेद 21) के बीच संतुलन तय होगा। तब तक, यूपी के जोड़ों को इन मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा:

  1. कानूनी अड़चनें—परिवार का समर्थन जुटाना या बिना पंजीकरण के रहना।
  2. सामाजिक दबाव—रूढ़िवादी परिवारों के विरोध का डर।

हालांकि फर्जी शादियों पर रोक लगाने का इरादा सही है, लेकिन यह नियम व्यक्तिगत स्वतंत्रता को नियंत्रित करने का हथियार बन सकता है। सुप्रीम कोर्ट की अनुच्छेद 21 की व्याख्या तय करेगी कि क्या यूपी (और अन्य राज्यों) के वयस्कों को बिना परिवार या सरकारी दखल के शादी करने का अधिकार मिलेगा।

आपकी राय?
क्या राज्यों को विवाह के लिए माता-पिता की सहमति अनिवार्य करनी चाहिए, या यह संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है? कमेंट में अपने विचार साझा करें!

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