भारत और रूस के बीच एक बड़ा समझौता होने वाला है, जिसके तहत इसी साल 10 लाख भारतीय कामगार रूस के सर्दोल्स क्षेत्र में काम करने जाएंगे। यह भारत और रूस के बीच अब तक का सबसे बड़ा श्रमिक प्रवास होगा, जो सीधे तौर पर पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों को चुनौती देगा। लेकिन सवाल यह है कि अगर रूस को भारतीय मजदूर चाहिए, तो अमेरिका और यूरोप को इतनी ऐतराज क्यों हो रही है?
रूस को भारतीय मजदूरों की जरूरत क्यों
रूस की जनसंख्या लगातार घट रही है, और वहां श्रमिकों की भारी कमी है। खासकर साइबेरिया और सुदूर पूर्वी क्षेत्रों में विकास के लिए कामगारों की आवश्यकता है। भारतीय मजदूरों के पास कुशलता और मेहनत करने की क्षमता है, जो रूस के लिए फायदेमंद साबित होगी।
भुगतान प्रणाली की चुनौती
रूस पर पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के कारण अंतरराष्ट्रीय भुगतान प्रणाली SWIFT से वह कटा हुआ है। ऐसे में, भारतीय मजदूरों को रूबल में मिलने वाली मजदूरी को भारत में कैसे भेजा जाएगा? इस समस्या के समाधान के लिए भारत और रूस एक नई भुगतान प्रणाली बना सकते हैं, जिस पर व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा के दौरान चर्चा हो सकती है।
अमेरिका और यूरोप को आपत्ति क्यों
अमेरिका और यूरोप नहीं चाहते कि भारत जैसा बड़ा देश रूस के साथ मजबूत आर्थिक साझेदारी बनाए। अगर 10 लाख भारतीय मजदूर रूस में काम करने लगेंगे, तो इससे दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंध और मजबूत होंगे। साथ ही, यह पश्चिमी प्रतिबंधों को कमजोर करेगा।
अमेरिकी धमकियां और भारत पर दबाव
हाल ही में अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने भारत को “निंदनीय” बताया, क्योंकि भारत रूस से तेल खरीद रहा है। अमेरिका ने भारत पर 500% तक के अतिरिक्त शुल्क लगाने की धमकी दी है। ऐसे में, अगर भारत रूस के साथ श्रमिक भेजने का समझौता करता है, तो अमेरिका और यूरोप के साथ संबंध और तनावपूर्ण हो सकते हैं।
भारत के लिए क्या है अवसर
अगर यह समझौता सफल होता है, तो भारत को रोजगार के नए अवसर मिलेंगे और रूस के साथ आर्थिक संबंध मजबूत होंगे। हालांकि, भारत को अमेरिका और यूरोप के साथ संतुलन बनाकर चलना होगा।
10 लाख भारतीय मजदूरों का रूस जाना सिर्फ रोजगार का मुद्दा नहीं, बल्कि एक बड़ी भू-राजनीतिक चाल है। अगर यह योजना सफल होती है, तो यह भारत और रूस के बीच एक नए युग की शुरुआत होगी, लेकिन पश्चिमी देशों की प्रतिक्रिया भी तीखी हो सकती है।