भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस बी.आर. गवई ने एक ऐतिहासिक फैसले में शेड्यूल्ड कास्ट (SC) और शेड्यूल्ड ट्राइब्स (ST) के लिए रिजर्वेशन में क्रीमी लेयर की अवधारणा लागू करने की बात कही है। इस फैसले के तहत आर्थिक और सामाजिक रूप से संपन्न दलितों को अब SC/ST कोटे का लाभ नहीं मिलेगा। यह फैसला रिजर्वेशन नीति में एक बड़ा बदलाव लाने वाला है, जो वर्षों से चर्चा में रहा है। जस्टिस गवई ने इस मुद्दे को 2023 में दायर एक जनहित याचिका (PIL) के दौरान उठाया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की संवैधानिक बेंच ने सुना। इस लेख में हम इस केस की पूरी जानकारी, क्रीमी लेयर की अवधारणा, और इसके SC/ST समुदाय पर प्रभाव को विस्तार से समझेंगे।
क्रीमी लेयर का कॉन्सेप्ट सबसे पहले 1992 के इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार (मंडल कमीशन केस) में सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की बेंच द्वारा पेश किया गया था। 16 नवंबर 1992 को दिए गए इस फैसले में क्रीमी लेयर को उन लोगों के रूप में परिभाषित किया गया, जो पिछड़े वर्ग से तो हैं, लेकिन आर्थिक और सामाजिक रूप से इतने समृद्ध हैं कि उन्हें रिजर्वेशन की जरूरत नहीं। यह कॉन्सेप्ट शुरू में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए लागू किया गया था, ताकि रिजर्वेशन का लाभ केवल जरूरतमंद लोगों तक पहुंचे। उदाहरण के लिए, अगर किसी के माता-पिता IAS, IPS या गजेटेड ऑफिसर हैं, तो उनके बच्चे सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े नहीं माने जाते। ऐसे में उन्हें रिजर्वेशन का लाभ क्यों मिले? वहीं, अगर किसी के पिता सब्जी बेचते हैं या ऑटो चलाते हैं, तो उनके बच्चों को रिजर्वेशन की जरूरत हो सकती है।
क्रीमी लेयर की पहचान के लिए सरकार ने आय सीमा निर्धारित की थी। 1993 में यह सीमा 1 लाख रुपये थी, जो 2004 में बढ़कर 2.5 लाख, 2008 में 4.5 लाख, 2013 में 6 लाख, और 2017 में 8 लाख रुपये हो गई। यह आय सीमा समय-समय पर संशोधित होती रही है। अब जस्टिस गवई ने इस कॉन्सेप्ट को SC/ST समुदाय पर भी लागू करने की वकालत की है। उनका कहना है कि रिजर्वेशन का उद्देश्य सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े लोगों को बराबरी का अवसर देना है। लेकिन अगर आर्थिक रूप से संपन्न लोग इसका लाभ उठा रहे हैं, तो यह नीति अपने मूल उद्देश्य से भटक रही है।
जस्टिस गवई ने 1 अगस्त 2024 को इस मामले में अपनी राय देते हुए कहा कि SC/ST समुदाय में भी क्रीमी लेयर की पहचान के लिए अलग मानदंड बनाए जाने चाहिए। उन्होंने जोर दिया कि रिजर्वेशन का लाभ केवल उन लोगों को मिलना चाहिए, जो वास्तव में जरूरतमंद हैं। उदाहरण के लिए, अगर किसी SC/ST व्यक्ति के माता-पिता उच्च पदस्थ अधिकारी हैं, तो उनके बच्चे रिजर्वेशन के हकदार नहीं होने चाहिए। यह फैसला सामाजिक न्याय को और परिष्कृत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
जस्टिस गवई स्वयं SC समुदाय से हैं और भारत के पहले बौद्ध CJI हैं। इसके बावजूद, उन्होंने निष्पक्षता के साथ यह राय दी कि रिजर्वेशन का लाभ केवल जरूरतमंदों तक पहुंचना चाहिए। उन्होंने कहा कि बिना क्रीमी लेयर की पहचान के, रिजर्वेशन के लाभ को संपन्न लोग हड़प लेते हैं, जिससे वास्तविक जरूरतमंद वंचित रह जाते हैं। इस फैसले को लागू करने के लिए सरकार को SC/ST के लिए क्रीमी लेयर की पहचान के अलग मानदंड विकसित करने होंगे, जो OBC से भिन्न हो सकते हैं।
2024 में इस मुद्दे पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की बेंच, जिसमें तत्कालीन CJI डी.वाई. चंद्रचूड़ और जस्टिस गवई शामिल थे, ने इस बात पर जोर दिया कि SC/ST में क्रीमी लेयर की अवधारणा लागू होनी चाहिए। यह फैसला रिजर्वेशन नीति को अधिक समावेशी और निष्पक्ष बनाने की दिशा में है, ताकि लाभ का समान वितरण हो।
जस्टिस गवई, जो 14 मई 2025 को CJI नियुक्त हुए, ने अपने कार्यकाल में कई महत्वपूर्ण फैसले दिए हैं। उन्होंने आर्टिकल 370, इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम, डीमोनेटाइजेशन, और फ्रीडम ऑफ स्पीच से जुड़े मामलों में अहम भूमिका निभाई। इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम को असंवैधानिक घोषित करने और डीमोनेटाइजेशन की वैधता पर फैसले में उनकी राय महत्वपूर्ण थी। इसके अलावा, उन्होंने न्यूज़क्लिक फाउंडर की गिरफ्तारी और अबाद यौन उत्पीड़न मामले में भी फैसले दिए।
जस्टिस गवई ने यह भी घोषणा की है कि वह रिटायरमेंट के बाद किसी सरकारी या संवैधानिक पद को स्वीकार नहीं करेंगे, जो उनकी निष्पक्षता और सिद्धांतों को दर्शाता है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में 81,000 लंबित मामलों और जिला अदालतों के बुनियादी ढांचे को बेहतर करने की जरूरत पर भी जोर दिया है।
यह फैसला रिजर्वेशन नीति में एक नया अध्याय जोड़ता है। यह सुनिश्चित करता है कि SC/ST समुदाय के भीतर भी रिजर्वेशन का लाभ केवल जरूरतमंदों तक पहुंचे। क्या आप मानते हैं कि रिजर्वेशन का लाभ उन लोगों को मिल रहा है, जिन्हें इसकी जरूरत नहीं? अगर आपके माता-पिता IAS या IPS जैसे उच्च पदों पर हैं, तो क्या उनके बच्चों को रिजर्वेशन का लाभ मिलना चाहिए? या यह लाभ उन तक पहुंचना चाहिए, जिनके परिवार आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े हैं? अपनी राय जरूर साझा करें।
क्या है क्रीमी लेयर का सिद्धांत
क्रीमी लेयर की अवधारणा सर्वप्रथम 1992 के इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार (मंडल आयोग केस) में सामने आई थी। इसके अनुसार, पिछड़े वर्ग के उन सदस्यों को आरक्षण से बाहर रखा जाना चाहिए जो आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पहले ही सशक्त हो चुके हैं। उदाहरण के लिए:
- जिनके माता-पिता आईएएस, आईपीएस या अन्य उच्च पदों पर हैं।
- जिनकी वार्षिक आय सरकार द्वारा निर्धारित सीमा से अधिक है (वर्तमान में OBC के लिए ₹8 लाख)।
- जिनके पास बड़ी संपत्ति या स्थायी सरकारी नौकरी है।
एससी/एसटी में क्रीमी लेयर क्यों जरूरी
- आरक्षण का मूल उद्देश्य पूरा नहीं हो रहा: डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने आरक्षण का उद्देश्य सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों को मुख्यधारा में लाना बताया था। लेकिन आज अमीर दलित परिवारों के बच्चे भी आरक्षण का लाभ लेकर प्रतियोगिताओं में सामान्य वर्ग के छात्रों से आगे निकल जाते हैं, जबकि गरीब दलितों को यह सुविधा नहीं मिल पाती।
- असमान वितरण: आरक्षण का लाभ उन्हीं परिवारों तक सीमित हो गया है जो पहले से ही सरकारी नौकरियों या व्यवसायों में स्थापित हैं।
- सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: CJI गवई ने कहा कि “आरक्षण उन्हीं को मिलना चाहिए जिन्हें वास्तव में इसकी आवश्यकता है। अगर किसी के पिता आईएएस अधिकारी हैं, तो उनके बच्चों को आरक्षण की जरूरत नहीं।”