10 अगस्त 2025 को, चुनाव आयोग ऑफ इंडिया (ECI) ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि बिहार की ड्राफ्ट चुनावी सूची से करीब 65 लाख नामों को अलग रखने वाली कोई अलग लिस्ट बनाने या उनके बाहर होने के कारण बताने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। यह बयान एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की याचिका के जवाब में आया, जिसमें आगामी बिहार विधानसभा चुनाव से पहले स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी का आरोप लगाया गया था।
कानूनी ढांचा और ECI की स्थिति
ECI ने जोर देकर कहा कि रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट, 1950 और रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स, 1960 के तहत सिर्फ ड्राफ्ट चुनावी सूची प्रकाशित करने और क्लेम्स व ऑब्जेक्शंस के लिए प्रावधान करने की जरूरत है, न कि कोई अलग डिलीशन लिस्ट बनाने की। हलफनामे में कहा गया कि ड्राफ्ट सूची में नाम न होना डिलीशन के बराबर नहीं है, क्योंकि यह एक प्रारंभिक दस्तावेज है जो बदलावों के अधीन है। नाम बाहर होने के पीछे कई वजहें हो सकती हैं, जैसे एन्यूमरेशन फॉर्म न लौटाना या घर-घर सत्यापन के दौरान गलतियां, लेकिन प्रभावित लोग 1 अगस्त से 1 सितंबर 2025 तक फॉर्म 6 भरकर और तय डिक्लेरेशन देकर अपना नाम शामिल करा सकते हैं।
ECI ने ADR के बड़े पैमाने पर नाम हटाने के आरोपों को खारिज करते हुए उन्हें “पूरी तरह गलत” बताया और NGO पर कोर्ट को गुमराह करने का आरोप लगाया। आयोग ने स्पष्ट किया कि मौत, माइग्रेशन या ट्रेस न होने जैसे कारण ड्राफ्ट स्टेज पर बताने की जरूरत नहीं, क्योंकि ये शामिल होने के कानूनी रास्ते को प्रभावित नहीं करते। रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स के रूल 19 के तहत, ऑब्जेक्शन पर सुनवाई नोटिस जारी करना जरूरी है, जहां कारण दिए जाते हैं।
पारदर्शिता के कदम और वोटरों की पहुंच
वोटर वेरिफिकेशन की चिंताओं पर ECI ने कहा कि EPIC कार्ड वाले हर वोटर अपना स्टेटस ऑनलाइन चेक कर सकते हैं, जहां BLO के कॉन्टैक्ट डिटेल्स भी मिलते हैं। आयोग ने 1 अगस्त को ड्राफ्ट सूची जारी करने से पहले उठाए गए कदमों का जिक्र किया, जैसे एन्यूमरेशन फॉर्म न मिलने वालों की बूथ-लेवल लिस्ट पार्टियों के साथ शेयर करना, जिला स्तर पर मीटिंग्स करना और 7 अगस्त को पोलिंग स्टेशन लेवल मीटिंग्स आयोजित करना। ये कदम 27 जुलाई के प्रेस नोट में पब्लिश हुए थे, जिसे ADR को पिछली सुनवाई में दिया गया था, इसलिए उनके नॉन-डिस्क्लोजर के दावे को “झूठा” बताया गया।
ECI ने ADR के पुरानी प्रैक्टिस से अलग होने के आरोप को भी खारिज किया, स्पष्ट करते हुए कि NGO का उदाहरण अप्रैल 2024 की फाइनल चुनावी सूची का था, न कि ड्राफ्ट का। SIR के बाद पब्लिश होने वाली फाइनल सूची में सारी डिटेल्स होंगी, आयोग ने आश्वासन दिया।
पक्षपात के आरोप और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
ADR ने BLOs द्वारा बड़ी संख्या में वोटरों को “नॉट रेकमेंडेड” मार्क करने पर चिंता जताई, साथ ही पार्टियों को ड्राफ्ट लिस्ट की पूरी पहुंच न होने का आरोप लगाया। ECI ने जवाब दिया कि BLO की रेकमेंडेशन सिर्फ एडमिनिस्ट्रेटिव है, न कि अंतिम, और ERO व असिस्टेंट ERO द्वारा चेक की जाती है। कोई नाम हटाने से पहले सुनवाई और रिजन्ड ऑर्डर जरूरी है।
यह विवाद राजनीतिक रंग ले चुका है। 8 अगस्त को सीतामढ़ी रैली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष पर SIR का विरोध करने का आरोप लगाया, क्योंकि इससे “घुसपैठियों” के नाम हट रहे हैं। INDIA ब्लॉक ने प्रक्रिया को मार्जिनलाइज्ड कम्युनिटीज को वोट से वंचित करने का तरीका बताया और चेतावनी दी कि यह पूरे देश में ऐसे पर्ज का प्रेसिडेंट सेट कर सकता है।
ECI का आश्वासन और आगे के कदम
एक अलग हलफनामे में, ECI ने सुप्रीम कोर्ट को भरोसा दिलाया कि बिहार में कोई योग्य वोटर को बिना नोटिस, सुनवाई और रिजन्ड ऑर्डर के नाम नहीं हटाया जाएगा। आयोग ने दस-पॉइंट इंक्लूजन प्लान का जिक्र किया, जिसमें घर-घर वेरिफिकेशन, पार्टी एजेंट्स के साथ काम, अर्बन कैंप्स, माइग्रेंट आउटरीच और वल्नरेबल वोटरों की स्पेशल मदद शामिल है। जस्टिस सूर्या कांत की अगुवाई वाली बेंच ने 6 अगस्त को ECI को कॉम्प्रिहेंसिव जवाब देने का निर्देश दिया था, अगली सुनवाई 12 अगस्त को है।
ECI ने ADR पर मीडिया में गलत नैरेटिव बनाने के लिए “भारी जुर्माना” लगाने और कोर्ट की अवमानना की कार्रवाई शुरू करने की मांग की। बिहार विधानसभा चुनाव की तैयारी में चुनावी सूची रिवीजन एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है, जो वोटर राइट्स और इलेक्टोरल ट्रांसपेरेंसी पर असर डाल सकता है।
