भारतीय वायु सेना के कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने इतिहास रच दिया है। वे अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) के लिए रवाना होने वाले पहले भारतीय बन गए हैं। यह मिशन 40 साल बाद किसी भारतीय का अंतरिक्ष में जाने का ऐतिहासिक अवसर है। राकेश शर्मा के बाद शुभांशु दूसरे भारतीय हैं जो अंतरिक्ष की यात्रा कर रहे हैं, लेकिन विशेष बात यह है कि वे ISS पर दो सप्ताह तक रहकर वैज्ञानिक प्रयोगों में भाग लेंगे।
यह मिशन एक्सियम स्पेस की ओर से आयोजित किया गया है, जो एक निजी अमेरिकी अंतरिक्ष कंपनी है। स्पेसएक्स के फाल्कन 9 रॉकेट ने फ्लोरिडा के केनेडी स्पेस सेंटर से क्रू ड्रैगन कैप्सूल को सफलतापूर्वक लॉन्च किया। इस मिशन में शुभांशु के अलावा अमेरिकी कमांडर पैगी विटसन, पोलैंड और हंगरी के एक-एक अंतरिक्ष यात्री शामिल हैं।
इस मिशन का विशेष महत्व इसलिए है क्योंकि यह भारत के महत्वाकांक्षी गगनयान मिशन के लिए महत्वपूर्ण अनुभव साबित होगा। शुभांशु इस मिशन से जो जानकारियां और अनुभव प्राप्त करेंगे, वह 2025 में होने वाले गगनयान मिशन में भारत के लिए बहुत उपयोगी साबित होंगे। उन्हें अंतरिक्ष यात्री प्रोटोकॉल, माइक्रोग्रैविटी में प्रयोग करने और अंतरिक्ष यान डॉकिंग जैसे महत्वपूर्ण कार्यों का प्रशिक्षण मिल रहा है।
मिशन के दौरान चारों अंतरिक्ष यात्री 60 से अधिक वैज्ञानिक प्रयोग करेंगे, जिनमें बायोटेक्नोलॉजी, मटीरियल साइंस और माइक्रोग्रैविटी के प्रभावों का अध्ययन शामिल है। विशेष रूप से हड्डियों और मांसपेशियों पर कम गुरुत्वाकर्षण के प्रभावों का अध्ययन किया जाएगा। इसके अलावा भारतीय प्रयोग के तहत पौधों में डीएनए मरम्मत प्रक्रिया का भी अध्ययन किया जाएगा।
इस मिशन को लेकर एक रोचक घटना घटी थी। मूल रूप से यह लॉन्च 29 मई को होना था, लेकिन तकनीकी समस्याओं के कारण इसे छह बार स्थगित करना पड़ा। सबसे गंभीर समस्या तब सामने आई जब रॉकेट के पहले चरण में लिक्विड ऑक्सीजन लाइन में दरार पाई गई। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के अध्यक्ष डॉ. एस. सोमनाथ ने इस मुद्दे पर गंभीर चिंता जताई थी और लॉन्च को तब तक स्थगित करने की सिफारिश की थी जब तक पूरी तरह से मरम्मत नहीं हो जाती।
इस मिशन की लागत लगभग 50 करोड़ रुपये है, जिसे भारत सरकार द्वारा वहन किया जा रहा है। यह निवेश भारत के भविष्य के अंतरिक्ष मिशनों के लिए महत्वपूर्ण साबित होगा। शुभांशु शुक्ला का यह मिशन न केवल भारत के लिए गर्व का विषय है, बल्कि यह अंतरिक्ष अन्वेषण के क्षेत्र में वैश्विक सहयोग का एक उत्कृष्ट उदाहरण भी है।
