भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और नासा (NASA) का संयुक्त उपग्रह निसार (NISAR) 30 मार्च को श्रीहरिकोटा से लॉन्च होने जा रहा है। यह दुनिया का पहला ड्यूल-बैंड (L & S बैंड) रडार इमेजिंग सैटेलाइट है, जो सेंटीमीटर स्तर तक के परिवर्तनों को ट्रैक करेगा।
भारत और अमेरिका ने मिलकर एक अत्याधुनिक सैटेलाइट, नासा-इसरो सिंथेटिक अपर्चर रडार (निसार), लॉन्च करने की तैयारी पूरी कर ली है। यह सैटेलाइट 30 जुलाई 2025 को शाम 5:40 बजे आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से जीएसएलवी F16 रॉकेट के माध्यम से लॉन्च किया जाएगा। इसरो और नासा के इस संयुक्त प्रयास का उद्देश्य पृथ्वी की सतह की उच्च रिजॉल्यूशन तस्वीरें प्राप्त करना है, जो पर्यावरणीय परिवर्तनों, प्राकृतिक आपदाओं और कृषि निगरानी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। यह मिशन दोनों देशों के लिए एक ऐतिहासिक कदम है, क्योंकि यह पहला मौका है जब इसरो और नासा मिलकर ड्यूल-बैंड रडार सैटेलाइट लॉन्च कर रहे हैं।
निसार क्या है और यह कैसे काम करता है
निसार का पूरा नाम नासा-इसरो सिंथेटिक अपर्चर रडार (NASA-ISRO Synthetic Aperture Radar) है। यह एक अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट है, जो दो प्रकार के रडार बैंड्स – एल-बैंड (25 सेमी वेवलेंथ) और एस-बैंड (10 सेमी वेवलेंथ) – का उपयोग करता है। ये रडार पृथ्वी की सतह और उसकी गहराई तक की उच्च रिजॉल्यूशन तस्वीरें लेने में सक्षम हैं। निसार सन-सिंक्रोनस ऑर्बिट में 750 किमी की ऊंचाई पर पृथ्वी का चक्कर लगाएगा और हर 12 दिन में पूरी पृथ्वी की मैपिंग करेगा। यह सैटेलाइट रेडियो वेव्स के माध्यम से डेटा एकत्र करता है, जो सतह से टकराकर वापस लौटती हैं और तस्वीरें बनाती हैं। इसकी स्वीप SAR तकनीक इसे 250 किमी के क्षेत्र को एक साथ स्कैन करने में सक्षम बनाती है।
निसार के प्रमुख उद्देश्य और लाभ
निसार सैटेलाइट का मुख्य उद्देश्य पृथ्वी की सतह पर होने वाले सूक्ष्म परिवर्तनों को सेंटीमीटर स्तर तक मॉनिटर करना है। इसके प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं:
- प्राकृतिक आपदाओं की भविष्यवाणी: बाढ़, तूफान, भूकंप और ज्वालामुखी गतिविधियों की सटीक निगरानी और पूर्व चेतावनी।
- ग्लेशियर और समुद्र तल की निगरानी: ग्लेशियर्स के पिघलने और समुद्र तल में वृद्धि का अध्ययन।
- कृषि और भूमि उपयोग: फसलों की निगरानी और भूमि उपयोग में परिवर्तनों का विश्लेषण।
- पर्यावरण संरक्षण: कार्बन डाइऑक्साइड के स्तर और पर्यावरणीय परिवर्तनों पर नजर।
यह सैटेलाइट प्रतिदिन 85 टेराबाइट से अधिक डेटा पृथ्वी पर भेजेगा, जो वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के लिए मुफ्त उपलब्ध होगा, जिससे मानवता की सहायता में योगदान मिलेगा।
सन-सिंक्रोनस ऑर्बिट: निसार की तकनीकी खासियत
निसार को सन-सिंक्रोनस ऑर्बिट (SSO) में स्थापित किया जाएगा, जो पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण और सूर्य की स्थिति के साथ संतुलन बनाए रखता है। यह ऑर्बिट सुनिश्चित करता है कि सैटेलाइट बिना अतिरिक्त ईंधन खर्च किए पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाए। सोलर पैनल्स इसकी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करेंगे, जिससे यह लंबे समय तक कार्य कर सके। इसकी कार्य अवधि लगभग 3 से 5 वर्ष तक होगी।
इसरो और नासा का योगदान
इस मिशन में इसरो और नासा की भूमिका स्पष्ट रूप से परिभाषित है:
- इसरो: जीएसएलवी रॉकेट, एस-बैंड रडार, डेटा कमांड्स, जीपीएस रिसीवर और सॉलिड स्टेट रिकॉर्डर प्रदान कर रहा है।
- नासा: एल-बैंड रडार और 12 मीटर व्यास का रिफ्लेक्टिंग एंटीना प्रदान कर रहा है।
इस मिशन की लागत लगभग 15 लाख करोड़ रुपये है, जिसमें इसरो का योगदान 800 करोड़ रुपये के आसपास है। यह सहयोग न केवल तकनीकी रूप से महत्वपूर्ण है, बल्कि भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को वैश्विक मान्यता भी दिलाता है।
चुनौतियां और तैयारी
निसार का लॉन्च पहले 2022 में प्रस्तावित था, लेकिन रडार एंटीना में तकनीकी खराबी के कारण इसे स्थगित करना पड़ा। एंटीना को अमेरिका वापस भेजा गया और 2024 में C130 कार्गो विमान के माध्यम से भारत लाया गया। अब सभी तैयारियां पूरी हो चुकी हैं, और सैटेलाइट को जीएसएलवी रॉकेट पर माउंट कर लिया गया है। लॉन्च के बाद 90 दिनों के भीतर सैटेलाइट के सिस्टम की जांच की जाएगी, जिसके बाद डेटा संग्रह शुरू होगा।
निसार का वैश्विक महत्व
निसार मिशन को “वन मिशन टू वॉच अर्थ” के रूप में जाना जा रहा है। यह सैटेलाइट न केवल भारत और अमेरिका के लिए, बल्कि पूरी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण है। जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आपदाओं और पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने में यह मिशन वैज्ञानिकों को सटीक और समयबद्ध जानकारी प्रदान करेगा। इसके डेटा का उपयोग वैश्विक शोधकर्ताओं द्वारा पर्यावरण संरक्षण और आपदा प्रबंधन के लिए किया जाएगा।
निसार सैटेलाइट भारत और अमेरिका के बीच अंतरिक्ष सहयोग का एक नया अध्याय है। यह मिशन पृथ्वी की निगरानी में क्रांति लाएगा और प्राकृतिक आपदाओं, पर्यावरण परिवर्तनों और कृषि निगरानी में महत्वपूर्ण योगदान देगा। 30 जुलाई 2025 को होने वाला यह लॉन्च भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की ताकत को दर्शाता है और वैश्विक स्तर पर इसरो की बढ़ती साख को रेखांकित करता है।
