डायबिटीज आज दुनिया भर में एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती बन चुकी है। यह बीमारी चुपके-चुपके लोगों को अपनी चपेट में ले रही है, और सबसे डरावनी बात ये है कि लाखों लोग बिना जाने इस बीमारी के साथ जी रहे हैं। हाल ही में सामने आई एक रिपोर्ट ने डायबिटीज को लेकर चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। आइए जानते हैं, क्या कहती है ये रिपोर्ट और क्यों इसे ‘मूक महामारी’ कहा जा रहा है।
डायबिटीज का बढ़ता दायरा: भारत बना ‘डायबिटीज कैपिटल’
डायबिटीज अब सिर्फ एक बीमारी नहीं, बल्कि वैश्विक स्वास्थ्य के लिए एक बड़ा खतरा बन चुकी है। भारत में इस बीमारी का प्रसार तेजी से बढ़ रहा है। 2023 में हुए शोध बताते हैं कि भारत में 10.1 करोड़ से ज्यादा लोग डायबिटीज से पीड़ित थे। यह आंकड़ा पहले के अनुमानों से कहीं ज्यादा है। मेटाबॉलिज्म से जुड़ी अन्य बीमारियों के साथ डायबिटीज के मामले बढ़ने से भारत को ‘डायबिटीज कैपिटल’ का टैग मिल चुका है।
खासकर ग्रामीण इलाकों में समय पर निदान और इलाज की कमी इस बीमारी को और खतरनाक बना रही है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि लाखों लोग बिना यह जाने कि उन्हें डायबिटीज है, अपनी जिंदगी जी रहे हैं। बिना इलाज के यह बीमारी धीरे-धीरे शरीर को नुकसान पहुंचाती है, जिससे आंखों की रोशनी कम होना, किडनी की समस्याएं, दिल का दौरा, नसों में कमजोरी और घाव न भरने जैसी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं।
चौंकाने वाली सच्चाई: 44% मरीजों को नहीं पता उनकी बीमारी
हाल ही में हुए एक वैश्विक विश्लेषण ने डायबिटीज को लेकर डराने वाले आंकड़े सामने रखे हैं। 2023 में दुनिया भर में 44% डायबिटीज मरीजों को यह पता ही नहीं था कि वे इस बीमारी से जूझ रहे हैं। खासकर निम्न और मध्यम आय वाले देशों में निदान की कमी और लगातार हाई ब्लड शुगर की स्थिति बड़ी चुनौती बन रही है।
द लैंसेट डायबिटीज एंड एंडोक्रिनोलॉजी जर्नल में प्रकाशित इस शोध के मुताबिक, भारत में भी अन-डायग्नोज्ड डायबिटीज की दर 43.6% के करीब थी। यानी, लगभग आधे मरीजों को अपनी बीमारी का पता ही नहीं था। यह स्थिति न केवल भारत, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक गंभीर चेतावनी है।
विशेषज्ञों की चेतावनी: बन सकती है ‘मूक महामारी’
अमेरिका के वाशिंगटन विश्वविद्यालय की शोधकर्ता और इस अध्ययन की प्रमुख लेखिका लॉरिन स्टैफोर्ड ने चेतावनी दी है कि अगर यही स्थिति रही, तो 2050 तक 1.3 अरब लोग डायबिटीज का शिकार हो सकते हैं। अगर इनमें से आधे लोगों को अपनी बीमारी का पता ही नहीं होगा, तो यह एक ‘मूक महामारी’ बन सकती है। इस शोध में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS), नई दिल्ली के विशेषज्ञ भी शामिल थे।
वैश्विक स्थिति और भारत की चुनौतियां
रिपोर्ट बताती है कि उत्तरी अमेरिका में डायबिटीज के निदान की दर सबसे ज्यादा है, जबकि उच्च आय वाले एशिया-पैसिफिक देशों (जैसे जापान और दक्षिण कोरिया) में इलाज की दर सबसे बेहतर है। दक्षिणी लैटिन अमेरिका, जैसे चिली और अर्जेंटीना, में मरीजों में ब्लड शुगर का स्तर सबसे बेहतर तरीके से नियंत्रित पाया गया। वहीं, मध्य उप-सहारा अफ्रीका में केवल 20% से भी कम मरीजों को अपनी बीमारी का पता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने 2022 में लक्ष्य रखा था कि 2030 तक 80% डायबिटीज मरीजों का निदान हो और उनमें से 80% का इलाज ऐसा हो कि उनका ब्लड शुगर और ब्लड प्रेशर नियंत्रित रहे। लेकिन मौजूदा स्थिति को देखते हुए यह लक्ष्य मुश्किल लग रहा है।
क्या है समाधान
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि डायबिटीज के बढ़ते मामलों को रोकने के लिए तुरंत कदम उठाने की जरूरत है। खासकर युवाओं में स्क्रीनिंग प्रोग्राम को बढ़ावा देना होगा। दवाओं और ग्लूकोज मॉनिटरिंग डिवाइस तक पहुंच को और आसान करना होगा। अगर समय पर जांच और इलाज हो, तो इस बीमारी को नियंत्रित करना संभव है।
डायबिटीज से बचने के लिए आपको अपनी लाइफस्टाइल में बदलाव लाने की जरूरत है। नियमित व्यायाम, संतुलित आहार और समय-समय पर ब्लड शुगर की जांच इस बीमारी को कंट्रोल करने में मदद कर सकती है। अगर आपने अभी तक अपनी जांच नहीं कराई, तो आज ही अपने नजदीकी डॉक्टर से संपर्क करें।
