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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला जब पीड़िता ने खुद कहा—”मैं रेप से ज्यादा लीगल सिस्टम से परेशान हूं।”

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Last updated: June 24, 2025 5:18 pm
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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला जब पीड़िता ने खुद कहा—"मैं रेप से ज्यादा लीगल सिस्टम से परेशान हूं।"
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हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) से जुड़े एक केस में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, जिसे “आई-ओपनर जजमेंट” भी कहा जा रहा है। यह फैसला अपने आप में अनोखा है क्योंकि इसमें एक ऐसा मामला सामने आया, जहां अपराध साबित होने के बावजूद आरोपी को सजा नहीं दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने आर्टिकल 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए आरोपी को बरी कर दिया।

Contents
केस की पूरी कहानीसुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

लेकिन ऐसा क्यों हुआ? इसका कारण यह था कि पीड़िता ने खुद कहा कि वह रेप से ज्यादा लीगल सिस्टम की प्रक्रिया से परेशान है। उसने कोर्ट से यह मांग की कि आरोपी को छोड़ दिया जाए। इस आर्टिकल में, हम इस केस की पूरी कहानी, सुप्रीम कोर्ट के फैसले और इससे जुड़े महत्वपूर्ण सवालों पर चर्चा करेंगे।

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: पॉक्सो एक्ट के तहत दोषी को माफी, पीड़िता के हक में न्याय

केस की पूरी कहानी


1. कैसे शुरू हुआ मामला


एक 13 साल की लड़की की दोस्ती एक 25 साल के लड़के से हुई।
दोनों के बीच प्यार हो गया, और लड़की ने घर छोड़कर उस लड़के से मंदिर में शादी कर ली।
लड़की की माँ को जब पता चला, तो उसने पॉक्सो एक्ट के तहत केस दर्ज करवाया, जिसमें लड़के पर किडनैपिंग और रेप के आरोप लगे।
2. पुलिस और कोर्ट की कार्रवाई


पुलिस ने लड़की को बचाया और उसे घर वापस भेज दिया।
लेकिन घर और समाज में उसे ताने और अपमान सहना पड़ा।
इस बीच, लड़की प्रेग्नेंट हो गई और उसकी एक बेटी हुई।
पॉक्सो कोर्ट ने लड़के को 20 साल की सजा सुनाई।


3. हाईकोर्ट का विवादास्पद फैसला
केस हाईकोर्ट पहुंचा, जहां कोर्ट ने कहा कि “किशोर लड़कियों को अपनी सेक्सुअल डिजायर्स को कंट्रोल करना चाहिए”।
इस टिप्पणी की काफी आलोचना हुई, और हाईकोर्ट ने आरोपी को बरी कर दिया।
केस सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जिसने हाईकोर्ट की टिप्पणी को गलत बताया।



सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला


सुप्रीम कोर्ट ने इस केस में तीन सदस्यीय कमेटी बनाई, जिसमें:
क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट
सोशल साइंटिस्ट
चाइल्ड वेलफेयर ऑफिसर
इस कमेटी ने पीड़िता से बात की और पाया कि:
✔ पीड़िता का कहना था कि वह रेप से ज्यादा लीगल सिस्टम की प्रक्रिया से परेशान है।
✔ उसने अपने पति को बचाने के लिए ₹1,35,000 का कर्ज लेकर वकीलों को पैसे दिए।
✔ उसकी बेटी अपने पिता के बिना बहुत रोती थी।
कोर्ट ने क्या फैसला दिया?
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि कानूनी तौर पर अपराध हुआ है (क्योंकि लड़की 18 साल से कम थी)।
लेकिन पीड़िता की भावनाओं और उसकी मानसिक स्थिति को देखते हुए, कोर्ट ने आर्टिकल 142 के तहत आरोपी को बरी कर दिया।
साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिए कि:
लड़की की पढ़ाई का खर्च सरकार उठाएगी।
उसकी बेटी को आंगनबाड़ी में एडमिशन दिलाया जाएगा।
उनके रहने और खाने की बेहतर व्यवस्था की जाएगी।
लड़की द्वारा लिया गया ₹1,35,000 का कर्ज चुकाया जाएगा।

इस फैसले से जुड़े बड़े सवाल


1. क्या पॉक्सो एक्ट में बदलाव की जरूरत है?
पॉक्सो एक्ट बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाया गया है, लेकिन कई मामलों में यह टीनएज रिलेशनशिप को अपराध बना देता है।
अगर दोनों पार्टनर्स कम उम्र के हैं और आपसी सहमति से रिलेशनशिप में हैं, तो क्या उन पर पॉक्सो एक्ट लागू होना चाहिए?


2. क्या कोर्ट्स के पास डिस्क्रीशन होना चाहिए?
सुप्रीम कोर्ट ने आर्टिकल 142 का इस्तेमाल करके न्याय किया, लेकिन हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के पास ऐसी शक्तियां नहीं हैं।
क्या पॉक्सो एक्ट में संशोधन करके कोर्ट्स को केस-बाय-केस डिस्क्रीशन देना चाहिए?


3. कंसेंट की उम्र (Age of Consent) पर बहस
भारत में कंसेंट की उम्र 18 साल है, लेकिन कई देशों में यह 16 साल है।
क्या इसे कम करके 16 साल किया जाना चाहिए?
पार्लियामेंट अभी तक इस पर कोई बदलाव नहीं कर पाई है।


सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला एक मिसाल है कि कानून सिर्फ तकनीकी रूप से सही होना ही काफी नहीं है, बल्कि न्याय संवेदनशील भी होना चाहिए। हालांकि, इस केस ने पॉक्सो एक्ट की कमियों को भी उजागर किया है, जिस पर कानून बनाने वालों को गंभीरता से सोचना होगा।
क्या आपको लगता है कि पॉक्सो एक्ट में बदलाव होना चाहिए? अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं!

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