सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में एक अनूठा विवाद तब सामने आया जब मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ के कार्यकाल में लगाई गई कांच की दीवार (पार्टिशन) को उनके उत्तराधिकारी सीजेआई बी. आर. गवई ने हटवा दिया। यह पूरा घटनाक्रम महज एक साल के भीतर घटित हुआ, जिसमें 2.6 करोड़ रुपये के निर्माण और 8 लाख रुपये के विध्वंस का खर्च सामने आया।
सुप्रीम कोर्ट के परिसर में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (CJI) डीवाई चंद्रचूड़ द्वारा 2022 में शुरू की गई कांच की दीवार परियोजना को एक साल से कम समय में हटा दिया गया। इस प्रक्रिया में करदाताओं के ₹2.68 करोड़ खर्च हुए, जिसमें दीवारें लगाने में ₹2.59 करोड़ और हटाने में ₹8.63 लाख का खर्च शामिल है। आज तक के पत्रकार अशोक कुमार उपाध्याय की आरटीआई से इस खर्च का खुलासा हुआ। यह घटना न केवल संसाधनों की बर्बादी को दर्शाती है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के प्रशासनिक फैसलों की स्थिरता पर भी सवाल उठाती है। इस लेख में हम इस विवाद के कारणों, इसके प्रभाव, और इसके पीछे की कहानी का विस्तृत विश्लेषण करेंगे।
कांच की दीवार परियोजना और इसका खर्च
नवंबर 2022 में, CJI डीवाई चंद्रचूड़ ने सुप्रीम कोर्ट परिसर को आधुनिक बनाने के लिए कई कदम उठाए, जिनमें से एक था पहली पांच अदालतों के बाहर ऐतिहासिक कॉरिडोर में कांच की दीवारें लगवाना। इसका उद्देश्य सेंट्रलाइज्ड एयर कंडीशनिंग को बेहतर करना और परिसर को आरामदायक बनाना था। इस परियोजना का ठेका सेंट्रल पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट (CPWD) की ई-टेंडर प्रणाली के माध्यम से मेसर्स बीएम गुप्ता एंड सन्स को दिया गया। आरटीआई के अनुसार, दीवारें लगाने में ₹2,59,79,230 का खर्च आया। हालांकि, एक साल से भी कम समय में इन्हें हटाने का फैसला लिया गया, जिस पर ₹8,63,700 का अतिरिक्त खर्च हुआ। इस तरह, कुल ₹2.68 करोड़ का खर्च करदाताओं के पैसे से वहन किया गया।
वकीलों का विरोध और व्यावहारिक चुनौतियां
कांच की दीवारों की स्थापना का सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) और सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन (SCAORA) ने तीव्र विरोध किया। वकीलों का कहना था कि इन दीवारों ने कॉरिडोर की चौड़ाई को काफी कम कर दिया, जिससे एक कोर्ट से दूसरी कोर्ट तक पहुंचना मुश्किल हो गया और भीड़भाड़ की स्थिति पैदा हुई। सबसे बड़ा मुद्दा यह था कि कोर्ट के दैनिक कामकाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले वकीलों से बिना किसी परामर्श के यह फैसला लिया गया। इस निर्णय को वकील समुदाय पर थोपा गया माना गया, जिससे असंतोष बढ़ा।
नए CJI का निर्णय: मूल स्वरूप की बहाली
CJI डीवाई चंद्रचूड़ के रिटायरमेंट के बाद, नए CJI संजीव खन्ना के कार्यकाल में इस मुद्दे पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। हालांकि, जून 2025 में जस्टिस बीआर गवई के 51वें CJI के रूप में कार्यभार संभालने के बाद स्थिति बदल गई। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को उसके मूल ऐतिहासिक स्वरूप में लौटाने का संकल्प लिया। फुल कोर्ट की बैठक में सभी जजों ने सर्वसम्मति से कांच की दीवारें हटाने का फैसला किया। इसके बाद, कॉरिडोर को पहले की तरह खुला और ऐतिहासिक बनावट में बहाल कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट प्रशासन ने इसे सामूहिक निर्णय के रूप में प्रस्तुत किया।
लोगो और अन्य बदलावों का उलटना
कांच की दीवारें हटाना ही एकमात्र बदलाव नहीं था। CJI गवई ने सुप्रीम कोर्ट के लोगो को भी उसके मूल स्वरूप में बहाल किया, जिसमें भारत का राजचिह्न केंद्र में होता है। यह लोगो सितंबर 2024 में CJI चंद्रचूड़ के कार्यकाल में बदला गया था। इस तरह, नए CJI ने कई प्रशासनिक फैसलों को उलट दिया, जिससे संसाधनों की बर्बादी के साथ-साथ प्रशासनिक निरंतरता पर सवाल उठे।
न्यायपालिका की स्थिरता पर प्रभाव
हर नए CJI के कार्यकाल में सुप्रीम कोर्ट के परिसर और कामकाज में बदलाव देखने को मिलते हैं। हालांकि, जब अगले CJI इन फैसलों को उलट देते हैं, तो यह न केवल करदाताओं के पैसे की बर्बादी का कारण बनता है, बल्कि न्यायपालिका की प्रशासनिक स्थिरता पर भी सवाल खड़े करता है। कांच की दीवारों का यह प्रकरण इस बात का उदाहरण है कि बिना व्यापक परामर्श के लिए गए निर्णय दीर्घकालिक नहीं रह पाते। सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे ने व्यापक चर्चा हासिल की, जहां लोगों ने इसे संसाधनों की बर्बादी और प्रशासनिक अस्थिरता के रूप में देखा।
करदाताओं के पैसे का दुरुपयोग
सुप्रीम कोर्ट का बुनियादी ढांचा केंद्रीय बजट से संचालित होता है, जो करदाताओं के पैसे से आता है। ₹2.68 करोड़ की लागत, जो महज एक साल में खर्च हुई, ने जनता में असंतोष पैदा किया। यह राशि कांच की दीवारों के निर्माण और हटाने में खर्च हुई, जो बिना ठोस परामर्श के लिए गए फैसले का परिणाम थी। यह प्रकरण इस बात को रेखांकित करता है कि सार्वजनिक धन का उपयोग कितनी सावधानी से किया जाना चाहिए।
स्थिर और विचारशील प्रशासन की जरूरत
सुप्रीम कोर्ट में कांच की दीवारों का बनना और हटना एक महत्वपूर्ण उदाहरण है कि कैसे बिना हितधारकों के परामर्श के लिए गए फैसले संसाधनों की बर्बादी का कारण बन सकते हैं। CJI डीवाई चंद्रचूड़ का आधुनिकीकरण का प्रयास स्वागत योग्य था, लेकिन वकीलों की अनदेखी इसकी असफलता का कारण बनी। CJI बीआर गवई द्वारा मूल स्वरूप की बहाली सुप्रीम कोर्ट की ऐतिहासिक गरिमा को बनाए रखने का कदम है, लेकिन यह घटना न्यायपालिका में दीर्घकालिक और स्थिर प्रशासनिक नीतियों की आवश्यकता को उजागर करती है। आप इस मुद्दे पर क्या सोचते हैं? अपनी राय कमेंट सेक्शन में जरूर साझा करें। इस जानकारी को शारदा यूनिवर्सिटी के सहयोग से हमारे इंटर्न आयुष प्रजापति ने संकलित किया है।