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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: गुजारा भत्ता में हर दो साल में 5% वृद्धि अनिवार्य

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Last updated: June 20, 2025 5:47 pm
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Supreme Court's historic decision: 5% increase in alimony every two years mandatory
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सुप्रीम कोर्ट ने तलाकशुदा महिलाओं के लिए गुजारा भत्ता (एलिमनी) से संबंधित एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जो भारत में तलाक के मामलों में एक नया मापदंड स्थापित करता है। इस फैसले के तहत, तलाकशुदा लेकिन अविवाहित महिलाओं को मिलने वाले गुजारा भत्ते में महंगाई को ध्यान में रखते हुए हर दो साल में 5% की वृद्धि अनिवार्य होगी। यह नियम सभी मौजूदा और भविष्य के एलिमनी मामलों पर लागू होगा। कोर्ट ने राखी साधु खान बनाम राजा साधु खान मामले में महिला को 50,000 रुपये मासिक गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया, साथ ही पति को एक फ्लैट का स्वामित्व पूर्व पत्नी के नाम ट्रांसफर करने का निर्देश दिया। यह फैसला महिलाओं के आर्थिक अधिकारों को मजबूत करने और उनकी जीवनशैली को बनाए रखने के लिए लिया गया है।

मामले की पृष्ठभूमि 1997 में राखी और राजा साधु खान की शादी से शुरू होती है। 1998 में उनके एक बेटे का जन्म हुआ, और 2008 में तलाक की कानूनी प्रक्रिया शुरू हुई। शुरुआत में राखी को 8,000 रुपये मासिक अस्थायी भत्ता मिलता था, जिसे 2016 में बढ़ाकर 20,000 रुपये और 2023 में 75,000 रुपये कर दिया गया, क्योंकि पति राजा कोर्ट में उपस्थित नहीं हुए। राजा ने तर्क दिया कि उनकी आय सीमित है और दूसरी शादी व माता-पिता की जिम्मेदारियों के कारण वह अधिक भत्ता नहीं दे सकते। हालांकि, कोर्ट ने उनकी दलील खारिज करते हुए कहा कि दूसरी शादी या अन्य जिम्मेदारियां पूर्व पत्नी के प्रति कर्तव्यों को कम नहीं कर सकतीं। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि चूंकि राखी ने पुनर्विवाह नहीं किया, वह विवाहित जीवन की जीवनशैली बनाए रखने की हकदार है।

इसके अतिरिक्त, राखी की मांग पर कोर्ट ने पति के स्वामित्व वाले फ्लैट का होम लोन चुकाकर उसे राखी के नाम ट्रांसफर करने का आदेश दिया, ताकि उसे बार-बार कोर्ट-कचहरी के खर्च से राहत मिले और वह स्थायी आवास पा सके। सुप्रीम कोर्ट ने महंगाई, सामाजिक स्थिति और रहन-सहन के स्तर को ध्यान में रखते हुए 50,000 रुपये मासिक भत्ता को उचित और न्यायसंगत माना। यह फैसला न केवल इस मामले तक सीमित है, बल्कि भविष्य में अन्य कोर्ट्स के लिए भी दिशानिर्देश के रूप में काम करेगा।

एलिमनी क्या है? यह तलाक के बाद एक पति या पत्नी द्वारा अपने पूर्व जीवनसाथी को दी जाने वाली वित्तीय सहायता है, ताकि उनकी आर्थिक जरूरतें पूरी हो सकें। भारत में यह हिंदू मैरिज एक्ट 1955 (धारा 24 और 25), विशेष विवाह अधिनियम 1954 (धारा 37), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) 2023 (धारा 144, जो सीआरपीसी की धारा 125 का नया रूप है), और प्रोटेक्शन ऑफ वुमेन फ्रॉम डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट 2005 के तहत संचालित होता है। एलिमनी तीन प्रकार की होती है: स्थायी (तलाक के बाद एकमुश्त या मासिक), अस्थायी (मुकदमे के दौरान), और मेंटेनेंस (पति-पत्नी और बच्चों के लिए मासिक खर्च)।

एलिमनी की पात्रता तब होती है, जब पत्नी के पास स्वतंत्र आय का स्रोत न हो, वह बीमार, अक्षम या वृद्ध हो, या तलाक के कारण उसकी आर्थिक स्थिति प्रभावित हुई हो। दिलचस्प बात यह है कि पति भी पत्नी से एलिमनी मांग सकता है, यदि वह बीमार, बेरोजगार या विकलांग है। भत्ता निर्धारण के मापदंडों में पति-पत्नी की आय, संपत्ति, विवाह की अवधि, जीवनशैली, उम्र, स्वास्थ्य, बच्चों की कस्टडी, और तलाक का कारण (जैसे क्रूरता या व्यभिचार) शामिल हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि भत्ता निर्धारण में पति की केवल वर्तमान आय ही नहीं, बल्कि सभी आय स्रोतों (जैसे किराया, संपत्ति, अन्य व्यवसाय) का लेखाजोखा लिया जाए। यदि पत्नी पुनर्विवाह करती है, तो भत्ता समाप्त हो सकता है, लेकिन पति का पुनर्विवाह भत्ते को प्रभावित नहीं करता। पति या पत्नी की मृत्यु पर भत्ते की देनदारी समाप्त हो जाती है। यह फैसला महंगाई के प्रभाव को स्वीकार करता है और यह सुनिश्चित करता है कि तलाकशुदा महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर रह सकें।

हालांकि, यह फैसला कुछ सवाल भी उठाता है। यदि पति की आय दो साल में नहीं बढ़ती या उसे आर्थिक कठिनाइयां होती हैं, तो 5% वृद्धि का बोझ कैसे वहन होगा? इसके अलावा, जमीनी स्तर पर एलिमनी का भुगतान अक्सर बंद हो जाता है, खासकर गैर-हाई-प्रोफाइल मामलों में, जहां केवल 10-20% मामले ही निरंतर भुगतान देखते हैं। यह फैसला महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करने के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके कार्यान्वयन में स्थानीय स्तर पर चुनौतियां आ सकती हैं।

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